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हर अंधेरे में मोमबत्ती ही सहारा

आंख खुलने और मुंदने तक लेटे रहना एक अनिवार्य स्थिति है। बीच का अंतराल अधिकतर दौड़ने में बीतता है। स्कूल में प्रवेश, रोजगार की तलाश, बस के लिए दौड़, बौराए वाहनों से बचने का प्रयास। कवि कैलाश वाजपेयी के शब्दों में इस उसूल के चंद समृद्ध अपवाद हैं, जो बड़े बाप के बेटे हैं, जब से जन्म हुआ लेटे हैं। आजकल सफलता की शर्त है कि कोई कितनी देर तेज दौड़ने में कितना समर्थ है और उसे इस उपलब्धि का ढोल पीटने में कितनी महारत है?

लोग दौड़ते-दौड़ते परेशान हैं। दौड़ जैसे प्रतीक से देश में एकता या कानून-व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा वैसी ही है, जैसे बिना दुर्घटना किसी अंधे की चौराहा पार करने की क्षमता। किसी भी मुद्दे के समर्थन या विरोध में दौड़ना निहायत विदेशी अवधारणा है। ‘मेक इन इंडिया’ के माहौल में हम उसकी नकल क्यों करें? इससे तो योग क्या बुरा है? दाढ़ी वाले बाबा द्वारा प्रचारित देश के हर शहर-गांव, पंचायत-पार्क में कपालभाति करते लोगों से मुल्क की अखंडता का आभास ही नहीं होगा, सेहत भी सुधरेगी। देश के कर्णधारों को सोचना चाहिए कि आजादी के बाद से कभी गरीबी हटाने, कभी विकास लाने के नाम पर वे हमें रात-दिन दौड़ ही रहे हैं। नतीजे के सिफर होने की खबर उन्हें भी है, और हमें भी। फिर भी दूर की हांकना उनकी आदत है। अब       तो हमें बख्शें।

किसी भी राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए दौड़ से अधिक कारगर मोमबत्ती-मार्च है। बिजली की मनमर्जी से कौन परिचित नहीं है? कब आए, कब जाए? ऐसे में मोमबत्ती का ही सहारा है। देश को दिशा देने वालों की स्मृति में मोमबत्ती से बेहतर प्रतीक क्या है?

मोमबत्ती-मार्च करके हम न केवल महापुरुषों को याद करने में समर्थ हैं, बल्कि अंधेरे शहर को एकाध घंटे के लिए ही सही, रोशनी देने में भी। इसी को एक पंथ दो काज कहा जाता है। सरकारी साङोदारी ऐसी कोशिशों में जरूरी भी है। अपना सुझाव है कि शासन सहयोग के बतौर हर प्रतिभागी को एकाध दर्जन मोमबत्ती फ्री में मुहैया कराए। माचिस लगाना हमारी आदत है। यह काम हम बखूबी कर लेंगे। अंधेरे से जूझने में बची मोमबत्तियां घर के काम आएंगी।

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