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पैदल चलकर हम बदल सकते हैं बहुत कुछ

अगर मुझे अपनी मरजी थोपने का अधिकार मिले, तो मैं चाहूंगा कि लोग ज्यादा पैदल चलें। हम पैदल तभी चलते हैं, जब हमें ऐसी जगह जाना होता है, जहां वाहन नहीं जा सकते। मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूं, जो अपने घर से निकलकर खरीदारी के लिए सड़क तक भी कार से जाते हैं। अमेरिका में ऐसे शहर भी हैं, जहां अगर आपके पास कार नहीं है, तो आप कहीं जा ही नहीं सकते। एक बार मैं लॉस एंजिलिस के बेवर्ली हिल्स में टहलना चाहता था, तो मुङो लोगों ने सनकी कहा था। जब आप पैदल चलते हैं, तो आप जगहों को एक अलग तरह से देखते हैं।

अगर आप किसी अजनबी से लिफ्ट मांगकर उसकी कार में बैठना चाहें, तो यह अक्सर उसकी दया, उसके अहं पर निर्भर करता है। कार में भी आप उसके अहं के साथ ही बैठते हैं, जबकि पैदल चलते हुए आप किसी से भी बात कर सकते हैं और यह साथ भोजन करने की तरह आत्मीय होता है। वैसे भी टहलते समय होने वाली बातचीत, ड्राइविंग के समय होने वाली बातचीत से ज्यादा अच्छी होती है। आप साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, साथ-साथ कदम बढ़ते हैं, कदमों की और शरीर की लय मिल जाती है। यह हमारे शरीर का परस्पर गान होता है, जिसके जरिये हर व्यक्ति अपने अनोखे ढंग से धरती पर अपनी आत्मा की इबारत लिखता है। मेरी चले, तो मैं लोगों से कहूं कि यहां बस का इंतजार करने की बजाय अगले स्टॉप तक पैदल जाओ। मैं चाहता हूं कि लोग जब तनाव में हों, तो वे पैदल चलें। जब कोई समस्या उन्हें परेशान कर रही हो, जब वे दुखी हों, तो वे पैदल चलें। मैं चाहता हूं कि जब लोग खुश हों, तो वे पैदल चलें, ताकि उनके अच्छे मूड का असर दुनिया पर पड़े।

यह संयोग नहीं है कि प्राचीन समय में पैदल चलने को सोचने से जोड़ा जाता था। प्लेटो की तस्वीरों में वह अपने शिष्यों से साथ टहल रहे होते हैं। बौद्ध परंपरा में पैदल चलने को ध्यान लगाने से जोड़ा जाता है, टहलने का संबंध सांस लेने से है, जो हमारी चेतना को मुक्त करती है। आजकल हम उस दुनिया से बाहर रहते हैं, जो हमने बनाई है। एक से दूसरी जगह जाते भी हैं, तो तेजी से पहुंचना चाहते हैं, रास्ते में ई-मेल भी चेक कर लेते हैं,  लेकिन पैदल चलना एक अलग चीज है। यह हमें जीवन के सही स्तर पर लाता है, चीजों की कुदरती गति के पास ले जाता है। अब तो मैं टहलते समय हेडफोन भी इस्तेमाल नहीं करता, क्योंकि यह कुदरती दुनिया की आवाजों का रोकता है।

आजकल हम एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं। बातचीत भी मुश्किल होती जा रही है। हम सवालों और नुक्ताचीनी के अनंत सिलसिले में फंस जाते हैं। दुनिया से रिश्ता टूटा है, तो खुद अपने से बातचीत भी कम हो गई है। अगर मैं एक दिन के लिए भी राजा बन जाऊं, तो सबसे पहले लोगों से इस जड़ता को खत्म करने के लिए कहूंगा।
साभार- द गार्जियन  (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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