DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ध्यान और जागरूकता

जब अशांति की तरंगें थम जाती हैं, तब जो बचती है, वह है शांति। अगर यह इतनी सहजता से उपलब्ध है, तो फिर हर कोई इसे क्यों नहीं पा सकता? वह इसलिए, क्योंकि इसे पाने का उपाय है ध्यान। ध्यान यानी पूरे होशो-हवास में अपने भीतर झांकना और भीतर की उलझन को सुलझाना। लोग सोचते हैं कि ध्यान के लिए समय नहीं है। लेकिन ध्यान के लिए अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं है, उसे बस अपनी दिनचर्या में शामिल कर लें। ध्यान का मतलब है सजगता। आप जो भी करें, जागरूकता से करें। आप जो भी कर रहे हैं, उसको ध्यान में बदला जा सकता है। ओशो ने इसकी कुछ विधियां बताई हैं।
 
स्वयं को कभी देखिए कि दिन में कितनी बार आप ‘नहीं’ कहते हैं और उस मात्रा को घटाइए। ‘न’ से आप सिकुड़ जाते हैं। फिर यह भी देखिए कि कितनी बार आप ‘हां’ कहते हैं और उसकी मात्रा को बढ़ाइए। जैसे ही आप ‘हां’ और ‘नहीं’ की मात्रा में थोड़ा-सा बदलाव करेंगे, तो आपके व्यक्तित्व में परिवर्तन होगा। नहीं कहने से अहंकार मजबूत होता है और आप दुखी होते हैं। इसके उलट जब भी आप ‘हां’ कहते हैं, तब अहंकार तो दुखी होता है, लेकिन आपका हृदय प्रसन्न होता है। प्रसन्नता को बढ़ाना है, तो अधिक से अधिक ‘हां’ कहने के मौके ढूंढिए।

अगली बार जब आप बीमार पड़ें, तो अपनी आंखें बंद कर लें और बिस्तर पर आराम करें और बस बीमारी को देखें। इसके विश्लेषण का प्रयास न करें, सिद्धांतों में न जाएं, बस इसे देखें। देह पूरी तरह से थक गई है, बुखार से तप रही है। अचानक आपको लगेगा कि आप बुखार से घिर गए हैं, लेकिन एक बहुत शीतल केंद्र आपके भीतर है, बुखार जिसे छू नहीं सकता। बीमारी जल्दी ठीक होगी। बीमारी लंबी चलती है, क्योंकि हम बीमारी का विरोध करते हैं।
                                   

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ध्यान और जागरूकता