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कांग्रेस की मुश्किल

स्थितप्रज्ञता का एक अर्थ सकारात्मक हो सकता है। इस संदर्भ में कि जहां हैं, वहां हैं। अपनी जमीन नहीं छोड़ी है। यह मामूली उपलब्धि नहीं है। मगर इससे बड़ा छलावा भी कुछ नहीं हो सकता। खासतौर पर ऐसे वक्त में, जब झंझावात चल रहा हो और वह ‘नीलोफर’ की तरह तट पर दम तोड़ता न दिखाई दे। कांग्रेस पार्टी शुतुरमुर्ग की तरह इस खुशफहमी में रही कि तूफान है, गुजर जाएगा। उसे नुकसान होगा, पर इतना नहीं कि बाद में खड़ा होना मुश्किल हो जाए। अप्रैल-मई 2014 के आम चुनाव को छह महीने होने को आए, लेकिन पार्टी की खुशफहमी खत्म होती नहीं लगती। उलटे उस पर एक भीषण थपेडम और पडम, जब वह महाराष्ट्र, हरियाणा के विधानसभा चुनाव हार गई। इन परिणामों ने कांग्रेस के उन नेताओं को चुप करा दिया, जो माने बैठे थे कि लोकसभा चुनाव में पार्टी जितना नीचे चली गई है, उससे नीचे नहीं जा सकती।.. कांग्रेस के पास विकल्प क्या हैं? क्या नेहरू-गांधी परिवार को ‘पथ-प्रदर्शक’ मान करके नेतृत्व किसी पूर्णकालिक जमीनी नेता को सौंपा जाए? या फिर पार्टी के अंदर उठने वाली यह इक्का-दुक्का मांग मान ली जाए कि नई ऊर्जा भरने के लिए प्रियंका गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाए? पहला विकल्प खारिज ही समझिए। दूसरे में भी कठिनाई बहुत है। राहुल की जगह प्रियंका को लाने का एक अर्थ वर्तमान नेतृत्व की अक्षमता स्वीकार करना हो सकता है। इसके साथ ही यह जुडम होगा कि क्या शीर्ष नेतृत्व से नेता चुनने में चूक हुई? बल्कि उससे दूसरे सवाल खड़े हो जाएंगे।

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