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रोहिग्या लोगों की पीड़ा

इसी महीने राष्ट्रपति बराक ओबामा म्यांमार के दौरे पर जा रहे हैं। उन्हें इस अवसर का इस्तेमाल मानवाधिकारों की पैरोकारी के लिए करना चाहिए और लगभग दस लाख रोहिग्या लोगों के साथ म्यांमार की हुकूमत जिस तरह का व्यवहार कर रही है, उसके खिलाफ उन्हें आवाज उठाना चाहिए। इस वक्त दुनिया की निगाहें तरह-तरह के मसलों में उलझी पड़ी हैं। ऐसे में, रोहिंग्या लोंगों की तकलीफों की तरफ बहुत कम ध्यान जा रहा है। मगर यह सुकून की बात है कि रोहिंग्या मुसलमानों के हित में हस्तक्षेप की मांग अमेरिका के भीतर की ही एक संस्था ने की है। ‘द यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम’ ने गुरुवार को राष्ट्रपति ओबामा से गुजारिश की वह म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों व दूसरी अल्पसंख्यक जमातों से जरूर मुलाकात करें और वहां की हुकूमत पर इस बात के लिए दबाव डालें कि वह उनके खिलाफ जारी ‘खौफनाक हिंसा’ पर तत्काल काबू पाए। संस्था ने यह भी मांग की कि वाशिंगटन म्यांमार के उन अधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंध जारी रखे, जो वहां के अल्पसंख्यकों पर जुल्म ढाने में शामिल हैं और म्यांमार पर आयद प्रतिबंधों को हटाने की शर्ते भी जमीनी सुधारों से जोडम्ी जानी चाहिए। म्यांमार में बौद्ध कट्टरपंथियों द्वारा अल्पसंख्यक जमातों का उत्पीड़न चरम पर पहुंच गया है और वहां का माहौल बेहद जहरीला हो गया है। यदि उस पर गौर नहीं किया गया, तो फिर शरणार्थी समस्या सीरिया के स्तर की खडम्ी हो सकती है। पिछले तीन हफ्तों में ही मलयेशिया में पनाह लेने के इरादे से 14, 500 रोहिंग्या म्यांमार के रखिन सूबे से थाईलैंड चले गए हैं। सांप्रदायिक दंगे रखिन की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। म्यांमार हुकूमत बलवाइयों पर काबू पाने की बजाय उनकी हिमायत करती रही है। मिसाल के तौर पर, म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या लोगों के आगे एक पीडमदायक विकल्प यह रखा कि वे इस बात को साबित करें कि उनका परिवार पिछले 60 वर्षों से अधिक वक्त से वहां रह रहा है और इस तरह वे दोयम दर्जे की नागरिकता के हकदार होंगे, वरना उन्हें शिविरों में जाना होगा। ऐसे में, ओबामा की छोटी-सी पहल लाखों लोगों की मुसीबतों के अंत की शुरुआत बन सकती है।  द पेनिनसुला, कतर

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