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सोनपुर मेला, गज-ग्राह युद्ध के मिथक से जुड़ा हाथियों का अकेला मेला

हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेले में हाथी बिकते नहीं, दान किए जाते हैं। चौंकिए मत, ऐसा ही होता है। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के कारण वर्ष 2001 से बिक्री पर रोक लगी तो दान का सिलसिला शुरू हो गया। दान करने पर कोई पाबंदी नहीं । न कोई अध्ििनयम आड़े आता है। लेकिन, दान किसी पंडा-पुजारी को नहीं, समाने शोभति प्रीति के सिद्धांत के आधार पर समान हैसियत वालों के बीच होता है। यानी एक हाथी पालक दूसरे पालक को दान करता है। दान का आदान-प्रदान भी होता है। यह दान है या कोई राज? कभी -कभी इस पर बहस चलती  है। कुछ सवाल भी उठते रहते हैं पर जो सामने है, उसे ही स्वीकार किया जाता है।

वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम लागू होने से मेले के हाथी बाजार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। वर्ष 1996 से  2000 तक मेले में हाथियों का कारोबार करने के लिए ओनर सर्टिफिकेट जरूरी कर दिया गया था। वन विभाग से सर्टिफिकेट लेने में भी परेशानी थी पर किसी तरह हासिल हो जाता था। उसके बाद अधिनियम को सख्ती से लागू कर दिया गया। नतीजतन, मेले का हाथी बाजार सिमटने लगा। वर्ष 1995 तक असम के जंगलों से हाथी लाए जाते थे। तब मेले के उत्तरी और दक्षिणी हथिसार उनसे गुलजार रहा करते थे। इधर कई वर्षो से हाथियों की संख्या सिमट कर चालीस के आसपास हो गयी है। इस बार अभी तक कुल 36 हाथी आये हैं। दक्षिणी हथिसार में 22 और 14 उत्तरी में। मोकामा के विधायक अनंत सिंह के हाथी भी आए हैं। इनके अलावा वैशाली, सीतामढ़ी, छपरा, सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मुजफ्फरपुर के साथ- साथ उत्तर प्रदेश के बलिया आदि जिलों से हाथी लाए गए हैं।

चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी हाथियों की खरीदारी
गज-ग्राह की पौराणिक कथा से जुड़े देश में हाथियों के सबसे बड़े या यों कहें कि इस अकेले मेले में हाथियों के आने-जाने और उनके क्रय-विक्रय का लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं, अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए बाबू वीर कुंवर सिंह ने इसी मेले में हाथियों और घोड़ों की खरीदारी की थी। पर्यटन विभाग की पुस्तिका में यहां तक कहा गया है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने इसी मेले से हाथियों की खरीदारी की थी। इतिहास का एक पन्ना यह भी है कि औरंगजेब ने यहां जंगी हाथियों को खरीदा था। इतिहास से आगे बढ़ते हैं तो दो दशक पहले तक दक्षिण भारत खासकर आंध्र के मठ-मंदिरों के लिए यहां से हाथी ले जाए जाते थे। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम से हाथी को मुक्त करने की मांग उठती रहती है। सोनपुर मेला समिति के सदस्य माधवेन्द्र कुमार सिंह का कहना है कि हाथियों की पूजा की जाती है और युगों से लोग उसे पालते आए हैं, इसलिए उसे अधिनियम के तहत नहीं रखा जाना चाहिए ।

मेले में मदमस्त होते रहे हैं हाथी
मेले में हाथी मदमस्त होते रहे हैं। इससे कई बार अप्रिय घटना भी हुई और लोगों को परेशान होना पड़ा। 18 नवंबर 2002 को सीवान जिले के रघुनाथपुर का भोला नामक हाथी सोनपुर थाने के गोविंदचक गांव के पास मदमस्त हो गया और उसने मेला यात्राियों से भरे एक आटोरिक्शा को उठाकर फेंक दिया। उस घटना में राधिका देवी नामक एक तीर्थयात्राी की मौत हो गयी और कई घायल हुए थे। हाथी को ट्रैंकुलाइजर गन से बेहोश कर नियंत्रित किया गया । ऐसी ही एक घटना वर्ष 1996 के मेले में हुई थी जब एक हाथी के मदमस्त हो जाने के कारण उत्तरी हथिसार में भगदड़ मच गयी । सारण के तत्काकलीन डीएम प्रत्यय अमृत और एसपी लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में पुलिस बल को उसे नियंत्रित करने  के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ी थी। उसके बाद भी मेले में कई बार हाथी मदमस्त हुए। मेले में ऐसे हाथियों को नियंत्रित करने के लिए हर साल एक खेदा पार्टी गठन किया जाता रहा है। बहरहाल हाथी इस मेले के खास फीचर हैं। उनसे ही मेले में नूर है।सोनपुर मेला, गज-ग्राह युद्ध के मिथक से जुड़ा हाथियों का अकेला मेला


हाजीपुर
 हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेले में हाथी बिकते नहीं, दान किए जाते हैं। चौंकिए मत, ऐसा ही होता है। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के कारण वर्ष 2001 से बिक्री पर रोक लगी तो दान का सिलसिला शुरू हो गया। दान करने पर कोई पाबंदी नहीं । न कोई अध्ििनयम आड़े आता है। लेकिन, दान किसी पंडा-पुजारी को नहीं, समाने शोभति प्रीति के सिद्धांत के आधार पर समान हैसियत वालों के बीच होता है। यानी एक हाथी पालक दूसरे पालक को दान करता है। दान का आदान-प्रदान भी होता है। यह दान है या कोई राज? कभी -कभी इस पर बहस चलती  है। कुछ सवाल भी उठते रहते हैं पर जो सामने है, उसे ही स्वीकार किया जाता है।

वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम लागू होने से मेले के हाथी बाजार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। वर्ष 1996 से  2000 तक मेले में हाथियों का कारोबार करने के लिए ओनर सर्टिफिकेट जरूरी कर दिया गया था। वन विभाग से सर्टिफिकेट लेने में भी परेशानी थी पर किसी तरह हासिल हो जाता था। उसके बाद अधिनियम को सख्ती से लागू कर दिया गया। नतीजतन, मेले का हाथी बाजार सिमटने लगा। वर्ष 1995 तक असम के जंगलों से हाथी लाए जाते थे। तब मेले के उत्तरी और दक्षिणी हथिसार उनसे गुलजार रहा करते थे। इधर कई वर्षो से हाथियों की संख्या सिमट कर चालीस के आसपास हो गयी है। इस बार अभी तक कुल 36 हाथी आये हैं। दक्षिणी हथिसार में 22 और 14 उत्तरी में। मोकामा के विधायक अनंत सिंह के हाथी भी आए हैं। इनके अलावा वैशाली, सीतामढ़ी, छपरा, सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मुजफ्फरपुर के साथ- साथ उत्तर प्रदेश के बलिया आदि जिलों से हाथी लाए गए हैं।

चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी हाथियों की खरीदारी
गज-ग्राह की पौराणिक कथा से जुड़े देश में हाथियों के सबसे बड़े या यों कहें कि इस अकेले मेले में हाथियों के आने-जाने और उनके क्रय-विक्रय का लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं, अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए बाबू वीर कुंवर सिंह ने इसी मेले में हाथियों और घोड़ों की खरीदारी की थी। पर्यटन विभाग की पुस्तिका में यहां तक कहा गया है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने इसी मेले से हाथियों की खरीदारी की थी। इतिहास का एक पन्ना यह भी है कि औरंगजेब ने यहां जंगी हाथियों को खरीदा था। इतिहास से आगे बढ़ते हैं तो दो दशक पहले तक दक्षिण भारत खासकर आंध्र के मठ-मंदिरों के लिए यहां से हाथी ले जाए जाते थे। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम से हाथी को मुक्त करने की मांग उठती रहती है। सोनपुर मेला समिति के सदस्य माधवेन्द्र कुमार सिंह का कहना है कि हाथियों की पूजा की जाती है और युगों से लोग उसे पालते आए हैं, इसलिए उसे अधिनियम के तहत नहीं रखा जाना चाहिए ।

मेले में मदमस्त होते रहे हैं हाथी
मेले में हाथी मदमस्त होते रहे हैं। इससे कई बार अप्रिय घटना भी हुई और लोगों को परेशान होना पड़ा। 18 नवंबर 2002 को सीवान जिले के रघुनाथपुर का भोला नामक हाथी सोनपुर थाने के गोविंदचक गांव के पास मदमस्त हो गया और उसने मेला यात्राियों से भरे एक आटोरिक्शा को उठाकर फेंक दिया। उस घटना में राधिका देवी नामक एक तीर्थयात्राी की मौत हो गयी और कई घायल हुए थे। हाथी को ट्रैंकुलाइजर गन से बेहोश कर नियंत्रित किया गया । ऐसी ही एक घटना वर्ष 1996 के मेले में हुई थी जब एक हाथी के मदमस्त हो जाने के कारण उत्तरी हथिसार में भगदड़ मच गयी । सारण के तत्काकलीन डीएम प्रत्यय अमृत और एसपी लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में पुलिस बल को उसे नियंत्रित करने  के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ी थी। उसके बाद भी मेले में कई बार हाथी मदमस्त हुए। मेले में ऐसे हाथियों को नियंत्रित करने के लिए हर साल एक खेदा पार्टी गठन किया जाता रहा है। बहरहाल हाथी इस मेले के खास फीचर हैं। उनसे ही मेले में नूर है।

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