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पहले चरण में कांग्रेस, राजद के प्रदेश अध्यक्षों की प्रतिष्ठा दांव पर

पहले चरण के 13 विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव में दो प्रदेश अध्यक्षों की प्रतिष्ठा दांव पर है। ये प्रदेश अध्यक्ष हैं कांग्रेस के सुखदेव भगत और राजद के गिरिनाथ सिंह। सुखदेव भगत लोहरदगा से भाग्य आजमा रहे हैं। वहीं गिरिनाथ सिंह गढ़वा से ताल ठोक रहे हैं। दोनों प्रदेश अध्यक्ष 2009 का विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और 2005 का विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं।

चुनावी घमासान में फंसे इन दोनों प्रदेश अध्यक्षों ने 25 नवंबर को होने वाले मतदान तक के लिए खुद को पार्टी की गतिविधियों से अलग कर रखा है। इनके सामने पहली चुनौती खुद के वजूद को बचाने की है। सुखदेव भगत का सामना भाजपा और आजसू गठबंधन के प्रत्याशी कमल किशोर भगत से है और गिरिनाथ सिंह का मुकाबला भाजपा प्रत्याशी सत्येंद्र नाथ तिवारी से है। तिवारी पिछली बार जेवीएम के टिकट पर विधायक चुने गए थे। उन्होंने ऐन चुनाव के वक्त पर पाला बदला और भाजपा का टिकट पाने में कामयाब हो गए।

दोनों हैं स्टार प्रचारक: सुखदेव भगत और गिरिनाथ सिंह दोनों का नाम उनकी पार्टियों ने स्टार प्रचारक के रूप में दिया है। लेकिन, ये स्टार प्रचारक पहले चरण का चुनाव प्रचार करने शायद ही निकल पाएं। हां, दोनों की पार्टियां तीसरे, चौथे और पांचवें चरण में इनका उपयोग कर सकती है। पांचवें चरण का नामांकन भी पहले चरण का मतदान खत्म हो जाने के एक दिन बाद शुरू होगा।


आधे दर्जन दिग्गजों को बचानी है अपनी साख
केएन त्रिपाठी:
प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री केएन त्रिपाठी डालटनगंज से विधायक हैं। वहीं से चुनाव भी लड़ रहे हैं। त्रिपाठी ने 2009 की विधानसभा चुनाव में दिलीप सिंह नमाधारी को हराया था। लेकिन 2005 के विधानसभा चुनाव में उनके पिता इंदर सिंह नामधारी से हार गए थे और कांग्रेस के टिकट पर चौथे नंबर पर रहे थे।

चंद्रशेखर दूबे: कई बार विधायक और सांसद तथा बिहार व झारखंड सरकार में मंत्री रहे चंद्रशेखर दूबे के लिए इस बार का चुनाव उनके राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है। उनके बेटे अजय दूबे उनकी विश्रामपुर सीट पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। बीच में तृणमूल में चले जाने के कारण कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया था।

इंदर सिंह नामधारी: बिहार सरकार में मंत्री, झारखंड विधानसभा के स्पीकर और सांसद रहे इंदर सिंह नामधारी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर चुके हैं। लेकिन डालटनगंज विधानसभा क्षेत्र से अपने बेटे के चुनाव अभियान की पूरी कमान संभाले हुए हैं। पुत्र दिलीप सिंह नामधारी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।

राधाकृष्ण किशोर: दलित नेता राधाकृष्ण किशोर पर भाजपा ने चुनावी दांव खेला है। किशोर पूर्व में मंत्री भी रह चुके हैं। पिछला विधानसभा चुनाव वे हार चुके हैं। हाल ही में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। उनका मुकाबला छतरपुर की सीटिंग जदयू विधायक सुधा चौधरी से है। राजद ने भी वहां से मनोज भुइयां को उतारा है।

कमलेश सिंह: पूर्व मंत्री कमलेश सिंह हुसैनाबाद से एनसीपी के उम्मीदवार हैं। कई आरोपों के चलते एहतियात के तौर पर अपने पुत्र का भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन कराया है। हुसैनाबाद सीट से वे पहले भी चुनाव जीत चुके है।

विनोद किस्पोट्टा: आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए विनोद किस्पोट्टा गुमला से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। उनके खिलाफ भाजपा के शिवशंकर उरांव मैदान में है। यह चुनावी सफलता ही राजनीति में उनकी तकदीर तय करेगी।

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