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मौजूदा राजनीति के दिलचस्प संकेत

पुराने जनता परिवार के बिखरे कुनबे को जोड़ने की कवायद फिर शुरू हो गई है। इस खबर को पढ़कर आपके मन में पहला विचार क्या आया? मुझे अनुमान लगाने की इजाजत दें। अगर आप 40 साल से लंबी जिंदगी जी चुके हैं, तो आपने सोचा होगा- ओह, बासी कढ़ी में नया उबाल! यदि आपकी आयु 30 वर्ष से कम है, तो शायद याददाश्त के कल-पुर्जे कुछ देर के लिए ‘हैंग’ हो गए होंगे। नौजवानों के लिए आसान नहीं है ‘जनता पार्टी’ को याद करना। यह अल्पजीवी दल 1977 में जन्मा और दो साल से पहले ही अपनी ताकत गंवा बैठा। जिस देश की 70 फीसदी आबादी 35 बरस से कम की हो, उसके लिए इस ‘परिवार’ के पुन: संगठित होने के क्या मायने हैं? गए गुरुवार की बैठक को याद करते हैं। मुलायम सिंह के सरकारी आवास पर इकट्ठा हुए इस जमावड़े में नीतीश कुमार, लालू यादव, शरद यादव, एचडी देवगौड़ा जैसी क्षेत्रीय शख्सीयतें शामिल हुईं। कहने की जरूरत नहीं।

मुलायम सिंह, नीतीश कुमार और लालू यादव देश के दो सूबों के सर्वाधिक कद्दावर नेताओं में हैं। देवगौड़ा की पार्टी का कर्नाटक में सपा और जद (यू) जैसा रसूख भले ही न हो, पर राष्ट्रीय पार्टियों की कमजोरी के क्षणों में सत्ता की चाबी उनके हाथ में आ सकती है। शरद यादव का फायदा यह है कि वह किसी भी राजनीतिक हस्ती के लिए अछूत नहीं हैं। ममता बनर्जी हों या नवीन पटनायक, वह सबसे बात कर सकते हैं। इस बैठक के लिए नवीन पटनायक और ममता को भी न्योता भेजा गया था, पर वे नहीं आए। क्यों? एक और सवाल- मायावती के बिना क्या उत्तर प्रदेश का यज्ञ ‘अश्वमेध’ में बदल सकता है? ध्यान दें। इस आयोजन के कर्ता-धर्ताओं ने कभी कांग्रेस की जोती जमीन पर अपनी फसल उगानी शुरू की थी।

उनकी इस जमींदारी पर इधर खतरा पैदा हो गया है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने लोकसभा से पहले जिस राजसूय यज्ञ की शुरुआत की, वह तेजी से आकार ले रहा है। दिल्ली की केंद्रीय सत्ता के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम बताते हैं कि गुजरात की इस जोड़ी ने समूचे देश पर असर डाल रखा है। अगर झारखंड में भारतीय जनता पार्टी बहुमत अथवा महाराष्ट्र जैसी स्थिति अर्जित कर लेती है और कश्मीर में भी सत्ता की भागीदार बन जाती है, तो यकीनन इस यज्ञ की ज्वाला क्षेत्रीय ताकतों के लिए दाहक बन जाएगी। कांग्रेस जब मूच्र्छा में हो, तो इन क्षत्रपों की भलाई इसी में है कि वे हर हाल में गैर-भाजपा वोटों के बंटवारे को रोकें। यही वजह है कि जिन लोगों ने रह-रहकर तीसरे मोर्चे के तिलिस्म को तोड़ा, वे फिर एकता का आलाप भर रहे हैं।

अगर यह ‘परिवार’ मुलायम सिंह और नीतीश कुमार जैसे दिग्गजों की अगुवाई में कोई राजनीतिक दल बनाता है, तो इसका यूपी और बिहार में असर पड़ सकता है। इस कवायद ने एक बात पूरी तरह साफ कर दी है। वह यह कि देश की राजनीति में उपजे शून्य को भाजपा ने तेजी से भरना शुरू कर दिया है। इस समय हालात भी उनके अनुकूल हैं। कांग्रेस और उनके तथाकथित सहयोगी ‘एंटी इनकंबेन्सी’ या अविश्वसनीयता के शिकार हैं। लोग विकल्प तलाश रहे हैं। फिर मोदी और शाह के सितारे भी जोर मार रहे हैं। क्या किसी ने सोचा था कि जयललिता को सजा हो जाएगी? लगभग डेढ़ दशक पहले जब जयललिता जेल गई थीं, तो द्रमुक के खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई थी। इस बार वहां उदासी है। करुणानिधि काल-जजर्र हो गए हैं। उनकी बेटी कनिमोङी और ए राजा पर भ्रष्टाचार के आरोप तय हो चुके हैं।

तमिल राजनीति कांग्रेस को मुंह चिढ़ा रही है। ऐसे में, भारतीय जनता पार्टी का ‘चांस’ तो बनता है। हां, काल-जजर्रता पर याद आया। तीसरे मोर्चे के ज्यादातर शीर्ष नेता 60 वसंत पार कर चुके हैं। अकेले अखिलेश यादव ही इसके अपवाद हैं। संसार के सबसे नौजवान देश को ये बुजुर्ग कैसे और कब तक संचालित कर सकेंगे? बुढ़ाते क्षत्रप अक्सर अपने सिद्धांतों से परे चले जाते हैं। शरद पवार इसके उदाहरण हैं। बरसों कांग्रेस के साथ सत्ता-अमृत छकने के बाद वह ‘सेक्युलरिज्म’ छोड़ देवेंद्र फडणवीस के समर्थक बन गए हैं। इसीलिए मोदी और शाह ने उस काम को नए ढंग से शुरू कर दिया है, जो कभी कांग्रेस ने किया था। आप याद करें, इंदिरा गांधी कांग्रेस की सबसे कद्दावर नेता हुआ करती थीं और उनकी छत्रछाया में तमाम नौजवान अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आकार देते थे। आधुनिक राजनीति के तमाम बड़े नेता उसी दौर की उपज हैं।

मोदी और शाह संघ के सहयोग से आज यही कर रहे हैं। क्या किसी ने सोचा था कि मनोहरलाल खट्टर और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बनेंगे? देश के अन्य राज्यों के ज्यादातर लोगों ने एक महीने पहले तक उनका नाम भी नहीं सुना था। मनोहर पर्रिकर का केंद्र में आगमन भी संदेश देता है कि देश के विभिन्न राज्यों में नए क्षत्रपों के उभार का दौर शुरू हो गया है। हम जब राजनीति में घिसे-पिटे मुहावरों और चेहरों के अभ्यस्त हो गए हों, तब यह प्रयोग आशा बंधाता है। यह अलग बात है कि इसके जोखिम भी हैं। क्या आनंदी बेन नरेंद्र मोदी की जगह ले सकती हैं? क्या फडणवीस, गोपीनाथ मुंडे या नितिन गडकरी की बराबरी कर पाएंगे? मनोहरलाल खट्टर हरियाणा की पहली भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री हैं। क्या वह पार्टी की अंदरूनी एकता को कायम रखते हुए भगवा दल को अगला चुनाव जितवा सकेंगे? इन सवालों का एक ही जवाब है- राजनीति में ‘रिस्क’ उठाना ही पड़ता है। मोदी और शाह यही कर रहे हैं।

अब आते हैं कांग्रेस पर। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए भी यह एक मौका है। 1984 में जब भाजपा दो सांसदों पर सिमट गई थी, तब माना गया था कि इस तरह की राजनीति की देश में गुंजाइश नहीं है। आज कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार के लिए भी यही कहा जा रहा है। ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि मनमोहन सिंह से पहले लगभग आठ साल पार्टी सत्ता से बाहर रही थी। इससे पहले राजीव गांधी जब 1989 का चुनाव हारे, तो लोगों ने माना कि देश की सियासत ‘चॉकलेटी चेहरों’ के लिए नहीं है।

दो साल बाद कांग्रेस फिर से दिल्ली की सत्ता पर काबिज थी। दुर्भाग्यवश राजीव उन गर्वीले क्षणों को जीने के लिए मौजूद नहीं थे, पर इसमें कोई दोराय नहीं कि जनता दल को अपदस्थ करने का करिश्मा उन्होंने ही किया था। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खूबी है कि यहां कुछ अंतिम नहीं है। जो आज तोला है, वह कल माशा हो सकता है और जो आज माशा है, वह कल तोला हो सकता है। राजनीति के इस सनसनीखेज खेल का एक मजेदार पहलू यह है कि इसके हिस्सेदार हम और आप भी हैं। आखिर हमारे ही वोटों से तो यह तोला और माशा का खेल चलता है।

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