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मैं प्रोजेक्ट नहीं चुनती, फिल्में दिल से चुनती हूं

फिल्म हैप्पी न्यू ईयर की सफलता से दीपिका पादुकोण काफी उत्साहित और खुश हैं। आठ साल पहले दीपिका ने फराह खान के निर्देशन में ओम शांति ओम से करियर की शुरुआत की थी। अब फराह के ही निर्देशन में दूसरी फिल्म हैप्पी न्यू ईयर करके एक बार फिर उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर सफलता का डंका बजा दिया है। शाहरुख के साथ यह उनकी तीसरी फिल्म है। हर तरफ से आ रही सफलता की खबरों के बीच दीपिका से बात की शांति स्वरूप त्रिपाठी ने:

ओम शांति ओम से अब तक के करियर को किस तरह से देखती हैं?
मेरी शुरुआत काफी फैंटास्टिक हुई थी। किसी गैर फिल्मी परिवार से आने वाली नई लड़की को शायद ही इस तरह का ब्रेक मिला हो। बाद में मेरी कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर ठीक नहीं चलीं। मैंने उसका उपयोग अपनी गलतियों का समझकर उन्हें सुधारने में किया। करियर का वह ‘लो फेज’ मुझे खुद को बेहतर बनाने के काम आया। मैंने कभी भी असफलता का गम नहीं मनाया। यह नहीं कहा कि ये सब मेरे साथ क्यों हो रहा है? धैर्य रखते हुए उस ‘फेज’ से उभरकर खुद को सफल बनाने का प्रयास किया। फिर कॉकटेल  से मेरे करियर को नया जीवन मिला।

बुरे वक्त में किसका सपोर्ट मिला?
कठिन वक्त में इंसान खुद ही अपनी मदद कर सकता है। साथ ही माता-पिता, भाई-बहन और दोस्तों का भी सहारा मिलता है। जब आप मुसीबत में हों, तो उस वक्त आपका अपना दिमागी संतुलन, आपका आत्मविश्वास सबसे ज्यादा काम आता है। सपोर्ट सिस्टम तभी मदद करता है, जब आप खुद निर्णय लेते हैं कि मुझे इस कठिनाई से उबरते हुए विजेता बनकर निकलना है।

आप बहुत चूजी हो गई हैं?
जी नहीं! 2013 में मेरी चार फिल्में आई थीं। इस साल मेरी दो फिल्में रिलीज हुईं। अगले साल पीकू, तमाशा और बाजीराव मस्तानी रिलीज होंगी। अब इससे ज्यादा कितना काम कर सकती हूं? मैं फिल्में गुणवत्ता के आधार पर ही चुनती हूं। तीन में से दो फिल्मों में मैं लीड रोल निभा रही हूं।

फिल्म तमाशा में आप एक बार फिर अपने पूर्व प्रेमी रणबीर कपूर के साथ हैं?
हमारे ब्रेक-अप को लंबा समय गुजर चुका है। हम दोनों प्रोफेशनल कलाकार हैं। ब्रेक-अप के बाद मैं रणबीर के साथ यह जवानी है दीवानी कर चुकी हूं। तब हमने एक साथ उस फिल्म का प्रमोशन भी किया था। लोगों ने उसमें हमारे इक्वेशन को पसंद किया था। हम दोनों एक साथ काम करते हुए सहज हैं।

इन दिनों ‘वुमन इंपावरमेंट’ की काफी बातें हो रही हैं?
जी हां! मैं होमी के साथ एक लघु फिल्म कर रही हूं, जो कि वुमन इंपावरमेंट को लेकर है। इन दिनों इस विषय पर तमाम लोग अलग-अलग तरह का काम कर रहे हैं। हमने तय किया कि हम एक लघु फिल्म बनाते हैं।

फिल्मों की सफलता का श्रेय अक्सर हीरो को जाता है। ऐसे में, आपके लिए बॉक्स ऑफिस की सफलता क्या मायने रखती है?
बॉक्स ऑफिस सफलता तो मेरे लिए भी मायने रखती है। मगर साथ में परफार्मेंस की चर्चा और अभिनय की प्रशंसा भी चाहिए। मुझे फिल्म की आलोचना भी चाहिए। एक कलाकार के तौर पर मैं चाहती हूं कि मैं ऐसी फिल्म करूं, जो निर्माता को पैसा कमाकर दे। वहीं मुझे अपनी अभिनय की प्रशंसा भी चाहिए। मेरे लिए फिल्म की सफलता के मतलब यह है कि फिल्म की रिपीट वैल्यू हो, यानी  मेरी फिल्म को लोग दस साल बाद भी देखना पसंद करें। जैसे कि लोग मुगल-ए-आजम या देवदास  को बार-बार देखना चाहते हैं। मैं जिस फिल्म के सब्जेक्ट या किरदार के साथ आइडेंटीफाई करती हूं, उसी में अभिनय करना पसंद करती हूं। मैं फिल्में दिल से चुनती हूं। मैं प्रोजेक्ट नहीं चुनती।

आप सलमान खान के साथ फिल्में क्यों नहीं करतीं?
यह डेस्टिनी का मामला है। मैं भी सलमान खान के साथ काम करना चाहती हूं और सलमान भी मेरे साथ काम करना चाहते हैं। हर चीज का अपना एक वक्त होता है। मुझे नहीं लगता कि मेरे पास यह ताकत है कि मैं किसी की फिल्म को करने से मना कर सकूं। पर मैं वह फिल्म चुनने का प्रयास करती हूं, जहां काम करते हुए इंज्वॉय कर सकूं। फिल्म की डेस्टिनी अलग बात है।

चेन्नई एक्सप्रेस में शाहरुख खान ने फिल्म की क्रेडिट में सबसे पहले आपका नाम दिया। आपको कैसा लगा?
मैं शाहरुख खान की इस बात के लिए प्रशंसा करूंगी। वह उन लोगों में से नहीं हैं, जिन्होंने एक बार कहा और फिर भूल गए। वह अपनी बाद की फिल्मों में भी वैसा ही कर रहे हैं। मैं इस बात से खुश हूं कि मेरा नाम पहले आता है। इसी के साथ मैं तो बराबरी में यकीन करती हूं। वैसे आप मेरा नाम पहले रखें या सबसे बाद में, इससे एक कलाकार के तौर पर मेरी मेहनत में कोई फर्क नहीं आएगा।

जब हीरो या हीरोइन, दोनों को एक समान मेहनत करनी पड़ती है। तो फिर हीरोइन को पैसे कम क्यों मिलते हैं?
पहले हीराइनों को जितने पैसा मिला करते थे, उसके मुकाबले पिछले एक-दो साल से बहुत ज्यादा पैसे मिलने लगे हैं। फिल्म इंडस्ट्री में हम सभी लोग हैं, समानता के लिए कोशिश कर रहे हैं। हम इस बात पर विचार नहीं करते हैं कि फिल्म की क्रेडिट में किसका नाम पहले जा रहा है और किसे कितना पैसा मिल रहा है। लेकिन फिल्म निर्माता की जिम्मेदारी होती है कि वह इन सभी बातों पर ध्यान दें। कॉरपोरेट के आने के बाद से फिल्में बनाना एक फॉर्मल प्रोसेस हो गया है। लेकिन अब फिल्में दिल से कम बनती हैं।

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