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वादे तो सभी ने किए..

14 साल में राजनीतिक दलों ने कई ऐसे वादे किए, जो आज भी कागजों पर ही हैं। वादों का यह सिलसिला इस चुनाव में भी रहेगा। जनता वादों पर विश्वास कर वोट देती है, फिर सरकारें आती हैं। विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री बनते हैं। सरकार बनने के बाद वादे हवा-हवाई साबित होते हैं। बात स्थानीयता की हो या नए राजधानी भवन की, बाजार समिति को भंग करने की हो या परिवहन निगम के गठन की, बातें बहुत होती हैं और यह बातों में ही रह जाती हैं। रांची के साथ धनबाद और जमशेदपुर में भी कई मुद्दे लटके पड़े हैं। अजय कुमार की रिपोर्ट


स्थानीयता
स्थानीयता हमेशा से राज्य के लिए बड़ा सवाल रहा है। हर विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दल वादे करते हैं कि सत्ता में आएंगे तो स्थानीय नीति बनाएंगे। सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन नीति आज तक नहीं बनी। बाबूलाल मरांडी की सरकार ने स्थानीयता का जिन्न पहली बार निकाला था। तब इसे लेकर हिंसा भी हुई थी। अर्जुन मुंडा सरकार ने 2010 में स्थानीयता तय करने के लिए कमेटी बनाई थी। सरकार चली गई, लेकिन कमेटी की रिपोर्ट नहीं आई। हेमंत सोरेन की सरकार बनी तो उसने भी कमेटी बनाई। यह सरकार भी स्थानीयता तय नहीं कर पाई। नेता एक बार फिर से वादे करने लगे हैं कि सत्ता में आए तो स्थानीयता तय करेंगे।

बाजार समिति
बाजार समिति भंग करने को लेकर भी वादे किए गए। भाजपा ने 2005 और 2009 के घोषणापत्र में वादा किया था मगर उसे पूरा नहीं किया। 2009 में सरकार बनी, तो भाजपा ने कहा कि कृषि मंत्री झामुमो का है, इसलिए बाजार समिति भंग नहीं करा सकते। 2010 में अर्जुन मुंडा की सरकार में कृषि मंत्री भाजपा के ही थे, लेकिन तब भाजपा अपने वादे से पीछे हट गई। कृषि मंत्री बनने से पहले सत्यानंद झा बाटुल ने बाजार समिति भंग करने की अनुशंसा सरकार से की थी। हेमंत सरकार में भी बाजार समिति भंग करने की बात आई, लेकिन वादा तो चुनावी वादा था, पूरा नहीं हो सका।


नई राजधानी
छत्तीसगढ़ ने अपने लिए नई राजधानी बना ली। झारखंड आज तक योजना ही बना रहा है। पहली सरकार से लेकर अब तक नई राजधानी की बात उठती रही है। पहली सरकार ने तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से शिलान्यास भी करा लिया। 14 साल बाद नई राजधानी के लिए एक ईंट तक नहीं लगाई जा सकी है। कभी सुकुरहुटू में नई राजधानी बनने की योजना बनी, तो कभी एचइसी में। अब अलग-अलग भवनों को बनाने की योजना बनी है। झारखंड हाईकोर्ट के लिए चाहरदिवारी का काम पूरा हो गया है। विधानसभा भवन का शिलान्यास हुआ था, लेकिन वह विवादों में फंस गया। सचिवालय सहित अन्य महत्वपूर्णभवनों के निर्माण को लेकर सरकार के पास योजना नहीं है।

परिवहन निगम
परिवहन निगम को लेकर भी सरकार की घोषणा समय के साथ बदलती रही है। अर्जुन मुंडा सरकार ने 2003 में सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दायर कर कहा था कि सरकार परिवहन निगम का गठन नहीं करना चाहती है, जबकि कई बार परिवहन मंत्रियों ने कहा है कि परिवहन निगम का गठन होगा। माधवलाल सिंह और एनोस एक्का ने परिवहन मंत्री रहते निगम के गठन का वादा किया था। आज हालात यह है कि सरकारी बस डिपो परिसरों में ताले लग गए हैं। करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हो रही है।

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