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4 विधानसभा क्षेत्रों में गांव नहीं, 35 में शहर नहीं

प्रदेश के चार विधानसभा क्षेत्रों से गांव की झलक अब गायब हो चुकी है। ये सीटें हैं रांची, जमशेदपुर पूर्वी, जमशेदपुर पश्चिमी और झरिया। ये पूर्ण शहरी आबादी वाले क्षेत्र हैं। इसी तरह 35 सीटें ऐसी हैं, जहां शहरी क्षेत्र नहीं है। चुनाव आयोग के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। विकास की तेज रफ्तार ने इन विधानसभाओं के बीचों बीच बसे गांवों पर अब शहर का लबादा डाल दिया है। साथ ही इनकी परिधि के विस्तार ने गांवों को दूर कर दूसरे विधानसभा क्षेत्रों का हिस्सा बना दिया गया है। झरिया में कोयले की खान के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों ने बिल्कुल ग्रामीण आबादी वाले इस इलाके को शहर की पहचान दी है। वहीं जमशेदपुर में हुए औद्योगिक विकास ने इस शहर के दो विधानसभा क्षेत्रों को कॉस्मोपोलिटन नेचर दिया है। रांची में यह परिवर्तन राजधानी बनने के बाद हुआ है।

संतालपरगना दिखा रहा है दूसरी तस्वीर: विकास का अहम पैमाना माने जाने वाले शहरीकरण की झांकी जहां चार विधानसभा क्षेत्रों में दिखती है, वहीं प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विकास का दूसरा पहलू 35 विधानसभा क्षेत्रों में दिखता है। यहां एक भी बूथ शहरी इलाके में नहीं है। यानी इन क्षेत्रों के नक्शे में नगरीकरण की आहट नहीं पड़ी है। शहर से अछूते नौ विधानसभा क्षेत्र संतालपरगना इलाके में हैं। इनके नाम बरहेट, लिट्टीपाड़ा, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, नाला, जामा, सारठ, पोरेयाहाट और महागामा है। यह क्षेत्र अभी विकास के निचले पायदान पर हैं। शहरी बूथों से वंचित विधानसभा क्षेत्रों का दूसरा बड़ा पॉकेट हजारीबाग, रामगढ़, चतरा और गिरिडीह के इलाके में है। यहां कोयला खनन के कारण रोजगार की संभावनाओं का विकास हुआ है लेकिन विकास के इन द्वीपों के खड़े होने के बाद भी इनकी परिधि में पिछड़ेपन के कम होने की स्थिति पर व्यापक असर नहीं पड़ा है।

तीन जिलों के लोग करते हैं बड़कागांव सीट पर मतदान
बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र में तीन जिलों के लोग मतदान करते हैं। ये जिले हैं हजारीबाग, रामगढ़ और चतरा। हजारीबाग जिले में इस सीट के 101 बूथ हैं। रामगढ़ जिले में 182 और चतरा जिले में केवल चौदह बूथ हैं। तीन जिलों में फैले बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र के अलग-अलग जिलों की सीमा में भौगोलिक विविधता भी देखने को मिलती है। हजारीबाग वाला हिस्सा जंगल और पहाड़ों से भरा है। रामगढ़ के इलाके में कोयले की खान है। चतरा का विस्तार मैदानी और खेती-बाड़ी वाला है।

ये समस्याएं आती हैं
1 विकास कार्य: विधायक निधि का पैसा विधानसभा सीट के मुख्यालय वाले जिले में आता है। सीट के दूसरे जिले वाले हिस्से में इस पैसे से विकास कार्य कराने के लिए उस जिले में पैसा ट्रांसफर कराना पड़ता है।
2 पहचान संबंधी समस्या: दूसरे जिले के कम हिस्से वाले लोगों के आवासीय प्रमाण-पत्र पर तो अपने जिले का नाम होता है, लेकिन उनके मतदाता पहचान-पत्र पर विधानसभा वाले जिले का नाम भी रहता है। इस कारण दूसरे प्रदेशों में दस्तावेज जमा करने पर कई बार परेशानी होती है।
3 प्रशासनिक समन्वय में कठिनाई: चुनाव कार्य का संचालन विधानसभा के मुख्यालय वाले जिले से होता है, लेकिन प्रशासनिक नियंत्रण दूसरे जिले के हाथ में होता है। इस कारण समन्वय में कठिनाई होती है।
4 जनप्रतिनिधियों को परेशानी: नुमाइंदों को दो जिला प्रशासन से तालमेल बैठाना होता है। दोनों जिलों की समितियों की बैठक में भाग लेना होता है। खासी भागदौड़ होती है।

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