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ताकि कारोबार करना आसान हो

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 30वीं इंडिया समिट हाल ही में खत्म हुई है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था। साथ ही, यह इस बात को परखने का पहला मौका भी था कि निवेशकों की धारणा किस तरह बदली है? खासकर उन निवेशकों की, जिनकी नजर इस समय भारत की ओर है। क्या बदलाव का उन पर असर पड़ा है या वे अब भी इसे दिखावटी ही मानते हैं? क्या मोदी ने किसी बड़े बदलाव की शुरुआत की है, या फिर वह सिर्फ लफ्फाजी कर रहे हैं? समिट के साथ हुई चर्चाओं में इन मसलों पर गहन बहस हुई। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जो भाषण दिया, वह सरकार की ओर से सबसे महत्वपूर्ण बयान था। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के प्रोफेसर क्लाज श्वाब से उन्होंने उन महत्वपूर्ण बदलावों का जिक्र किया, जो पिछले पांच महीनों में हुए हैं। और उन बदलावों का भी, जो आने वाले समय में होने वाले हैं। संसद का शरदकालीन सत्र इन बदलावों को और आगे ले जाएगा, खासकर जीएसटी और बीमा नियामक जैसे अटके हुए मसलों को। एक बात तो कही ही जा सकती है कि निवेशकों के हौसले इस समय बुलंद हैं।

निराशा की जगह अब बड़ी उम्मीदों ने ले ली है। मैंने खुद इस सम्मेलन के प्रशासन व पारदर्शिता से संबंधित दो सत्रों में भाग लिया। निवेशकों की एक पुरानी शिकायत रही है कि उन्हें बहुत ज्यादा अनुमति और स्वीकृतियां लेनी पड़ती हैं, काम शुरू होने में देर होती है और केंद्र व राज्य से संबंधित मसले भी हैं। ये सब उससे जुड़ी बातें हैं, जिसे हम कारोबार करने की आसानी कहते हैं। कारोबार करने की आसानी का अर्थ यह है कि नया कारोबारी निवेश के कितने अवसर देखता है। 2014 में इसके सूचकांक में भारत 189 देशों की सूची में 142वें नंबर पर था। मोदी सरकार को यह तुरंत ही समझ में आ गया था कि इस मोर्चे पर बड़ा सुधार करना है। इस सरकार ने यह लक्ष्य बनाया है कि भारत का नाम शीर्ष के 50 देशों में आ जाना चाहिए। पर यह बहुत बड़ा लक्ष्य है।

कारोबार करने की आसानी का सूचकांक दस चीजों पर निर्भर करता है- कारोबार की शुरुआत, निर्माण की इजाजत लेना, विद्युत कनेक्शन लेना, संपत्ति की रजिस्ट्री कराना, कर्ज लेना, निवेशकों की सुरक्षा, करों का भुगतान, सरहद पार का कारोबार, समझौतों को लागू करना, दिवालिया होने की सूरत में निपटारा। इनमें से समझौतों को लागू करना, निर्माण की इजाजत और दिवालिएपन का निपटारा ऐसे मसले हैं, जिनमें भारत का रिकॉर्ड बहुत खराब है। जैसे, भारत में किसी समझौते के लागू होने में औसतन तीन साल आठ महीने लगते हैं, जबकि चीन में एक साल दो महीने और सिंगापुर में तो सिर्फ पांच महीने लगते हैं। सरकार ने ऐसे कई कदम उठाए हैं, जिनसे फैसले तेजी से हों, नियमन का भार कम हो और कारोबार शुरू करने की लागत भी कम की जा सके। वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय ने इसके लिए कई फैसले किए हैं, जिसमें कारोबार के लिए एक ही दिन में रजिस्ट्रेशन की सुविधा, सभी श्रम कानूनों के लिए एक ही रजिस्ट्रेशन और करों की संख्या में कटौती जैसे फैसले शामिल हैं। औद्योगिक नीति और प्रोत्साहन विभाग ने प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों से संबधित 46 ऐसे कार्यबिंदु तय किए हैं, जिनसे निवेश को आकर्षित किया जा सकता है। कंपनी विभाग से कहा गया है कि वह कारोबार शुरू करने के लिए कंपनी सील और चुकता पूंजी की बाध्यता को खत्म करे।

इसी के साथ कई कानूनों में बदलाव का फैसला भी हुआ है। इसी तरह, एक सिफारिश यह भी है कि करों की संख्या कम की जाए, करों के ऑनलाइन भुगतान की सुविधा हो, कर प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, जीएसटी को तेजी से लागू किया जाए और सेज परियोजनाओं का विकास करने वालों के लिए न्यूनतम कर की बाध्यता को खत्म किया जाए। मोदी सरकार को इनके अलावा भी कई मुद्दों पर सुधार करना होगा। पहला, नियामक व्यवस्था को दुरुस्त करना, ताकि उनके नियम-कायदे बार-बार मानने की लागत कम हो। भारत का कुलजमा नियामक माहौल निजी निवेशकों के बहुत ज्यादा हित में नहीं है। हमें नियामक व्यवस्था में सुधार करना होगा, ताकि नियामक संस्थाओं के पास स्पष्ट आदेश हो, वे स्वायत्त हों और उनकी कुशलता बढ़े।

दूसरा, भारत में कारोबार की आसानी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मसला है राज्यों में नियामक सुधार करना। अलग-अलग राज्यों की नियामक संस्थाओं में बहुत बड़ा अंतर है, जिसका आर्थिक कामकाज पर भारी असर पड़ता है। इस वजह से केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने कारोबार के मामले में ज्यादा अच्छी उपलब्धियां हासिल कर ली हैं। पूरे देश में नियामक माहौल को सुधारने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को आपस में तालमेल बनाना होगा। कारोबार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को सभी सरकारों को सभी स्तरों पर दूर करना होगा। तीसरा, कानूनी व प्रशासनिक सुधार। उन कानूनों व नियमों की समीक्षा जरूरी है, जो निवेशकों को दूर करते हैं, खासकर समझौतों से पैदा विवादों के निपटारे के मामले में। इसके अलावा, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के तहत पीठ के जल्द गठन और मामलों के तेज निपटारे की व्यवस्था भी करनी होगी। इसके साथ ही प्रशासनिक सुधार भी जरूरी हैं, ताकि लालफीताशाही को रोका जा सके, प्रक्रियाएं सरल हो सकें और प्रशासनिक नियम-कायदे व बाधाएं कम हों।

अंत में, कारोबारियों को आकर्षित करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का होना सबसे बड़ी जरूरत है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह जैसी बुनियादी सुविधाओं का नाकाफी होना और विद्युत व जल आपूर्ति का संकट कारोबार शुरू करने की सबसे बड़ी बाधाएं हैं। अगर कारोबार करने की आसानी सूचकांक में भारत की स्थिति सुधारनी है, तो इसके लिए अगले कुछ महीने बहुत महत्वपूर्ण साबित होंगे। इस दौरान निवेशकों की सोच तेजी से बदलेगी। इस बदली सोच से ही पूंजी के आगमन का रास्ता खुलेगा। इस दौरान यह भी पता चल जाएगा कि आर्थिक विकास दर में जो तेजी दिख रही है, वह वास्तविक है या फौरी। भारत की विकास गाथा को फिर से पटरी पर लाना न सिर्फ गरीबी हटाने की नजर से जरूरी है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिहाज से भी खासा महत्वपूर्ण है। इससे यह भी पता लगेगा कि भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने के लिए किस कदर प्रतिबद्ध है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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