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खतरे में है पर्वतीय शहरों का जीवन

हाल ही में शिमला के लोगों को अपने नगर निगम और यूएनडीपी (संयुक्त राष्ट्र  विकास कार्यक्रम) की एक दस्तावेज से यह जानकर हैरानी हुई कि उनके शहर की 98 बड़ी इमारतें गंभीर भूकंप के झटकों को सहने में सक्षम नहीं हैं। इसके अलावा, 72 निर्माणों तक बचाव दल का समय पर पहुंचना कठिन है, क्योंकि यहां मोटरगाड़ी नहीं पहुंच सकती। ऐसी किसी आपदा से बचने के लिए खुला स्थान कुल भूमि के एक प्रतिशत से भी कम है। इस शहर में फायर ब्रिगेड स्टाफ की कमी तो आश्चर्यजनक हद तक पाई गई है। यहां के निर्वाचित प्रतिनिधियों, अधिकारियों व विशेषज्ञों ने स्वयं स्वीकार किया है कि सुरक्षा नियमों का जबरदस्त उल्लंघन हुआ है, जबकि शहर अधिक भूकंप के खतरे वाले क्षेत्र में है। इस स्थिति में बड़ी संख्या में मानवीय जीवन की क्षति की जो आशंकाएं विशेषज्ञों ने व्यक्त की हैं, वे दिल कंपा देने वाली हैं। दूसरी ओर, नैनीताल, मसूरी जैसे अन्य बड़े हिल स्टेशनों में एकत्र हो रहे खतरों के बारे में भी जानकारियां मिलती रही हैं। एक समय मसूरी के पास का क्षेत्र चूना खनन से बुरी तरह त्रस्त हो गया था, तब बहुत प्रयास कर इस खनन पर रोक लगी थी।

खतरे केवल बड़े हिल स्टेशनों तक सीमित नहीं हैं। गढ़वाल का श्रीनगर शहर वहां बन रही बांध परियोजना से बुरी तरह त्रस्त है। पहले एक बार इसमें बर्बादी हुई, फिर दूसरी बार बांध में दुर्घटना होते-होते बची। बांध-परियोजनाओं के पास स्थित कई पर्वतीय शहरों का संकट बढ़ गया है। देश के पर्वतीय क्षेत्रों में जितने शहर हैं, लगभग उतनी ही तरह की चिंताएं भी हैं। हाल में घोषणा हुई है कि स्मार्ट सिटी की योजना में कुछ पर्वतीय शहरों को भी शामिल किया जाएगा। पर यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन शहरों के आधुनिकीकरण की इस योजना में शहरों और उनके निवासियों की सुरक्षा का तंत्र विकसित करना शामिल है या नहीं। जिस तरह की गंभीर आपदाएं हाल में जम्मू-कश्मीर व उससे पहले उत्तराखंड के हिस्सों को झेलनी पड़ी हैं, उन्होंने पर्वतीय शहरों को बड़ी आपदाओं की आशंकाओं के प्रति सचेत कर दिया है।

इन जानकारियों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह एक बड़ी चेतावनी की तरह है। पर्वतीय शहरों, विशेषकर हिमालय के शहरों का पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील होना एक ऐसा तथ्य है, जिसका ध्यान हर योजना में रखने की जरूरत है। इसे बार-बार याद दिलाना जरूरी है, क्योंकि अभी तक इस मामले में बहुत असावधानियां हुई हैं। एक ओर तो नियमों को ताक पर रखकर निर्माण कार्य बहुत बढ़ा दिए गए हैं, दूसरी ओर खनन, वनों की कटाई व अन्य कारणों से क्षेत्र में अस्थिरता व क्षति की आशंका बढ़ गई है। अभी तक तो ये पर्वतीय क्षेत्र औपनिवेशिक दौर में विकसित किए गए हिल स्टेशनों पर होने वाले पर्यटकों का दबाव ही झेल रहे थे, लेकिन अब वे संपत्ति की कीमतों और निमार्ण कार्यों में आई तेजी से त्रस्त हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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