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थैंक्यू कहने तक मुस्कराते रहिए, प्लीज

वह माननीय थे। एक छोटे-से समूह में लंबी झाड़ पकड़े खड़े थे। सामने दो-चार सूखे पत्ते डाल दिए गए थे। लगता था कि झाड़ पकड़े माननीय पूरे पार्क की सफाई करके आए हों। फोटोग्राफर ने कहा- माननीय प्लीज। मुस्कराइए! वह अपनी पत्नी समेत तब तक मुस्कराते रहे, जब तक कि फोटोग्राफर ने थैंक्यू नहीं कहा। उनके जाने के बाद दूसरे माननीय ने झाड़ पकड़ी और फोटो खिंच जाने तक सफाई अभियान के नारे लगाए। इस बीच नगर निगम के असली सफाई कर्मचारी पार्क के बाहर इंतजार करते रहे कि कब ये फोटू खिंचाई खत्म हो और कब वे इस पर वास्तविक झाड़ फेरें। वैसे भी हमारी सभ्यता में गंदगी फैलाने वाले लोग खुद सफाई नहीं करते। गंदगी फैलाना कुछ लोगों का अधिकार है। उस गंदगी की सफाई करना कुछ लोगों का कर्तव्य। कुछ वोटरों को तो गंदगी ढोते समय नाक पर रूमाल और पेट में दारू रखनी पड़ती है। उनकी तस्वीर नहीं खींची जाती। कभी खिंच गई, तो फोटो से बू नहीं जाती।

माननीय लोग झाड़ पकड़कर जन-कल्याण की मैली वैतरणी पार करके संसद में प्रवेश करते ही धन्य होने के लिए अभिशप्त हैं। वे स्वयं एक ‘लहर’ पर सवार हैं। अदृश्य लक्ष्मी जी उनका फीलपांव दबा रही हैं। दिल्ली को क्या कहें? न कुंवारी, न सुहागन। हाथों में मेंहदी रचाए कब से बैठी है। दूल्हा क्या कोई घोड़ा तक नहीं आ रहा। मेरे एक जलकुकड़ आलोचक मित्र का कहना है कि देखना ये भगवा झाड़धारी अब पूरे देश की सफाई करेगा। मन की सफाई जब पूजाघर में नहीं हो पाती, तो बाथरूम में क्या होगी? मन से किया गया पाप ही पाप की श्रेणी में आता है। तन से किया गया पाप, तो क्षणभंगुर होता है। हमारे शहर की बदबूदार गलियों में सफाई हो गई, तो तहजीब, तमद्दुन और इतिहास को खतरा है। पर्यटन पर तो बुरा असर पड़ेगा ही। इसीलिए यहां का पुरातत्व कूड़ा ओढ़े पड़ा रहता है। राजस्व देने वाली इस गंदगी में नगर निगम, संस्कृति व पर्यटन विभाग और नगर विकास कार्यक्रमों का बराबर हिस्सा है। यहां से नाक पर रूमाल रखकर वाजिद अली शाह तक को भागना पड़ा था। वहां कौन माई का लाल हाथ में झाड़ लेकर फोटू खिंचवा सकता है? चाहे वह किसी रंग का हो।

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