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मुझे कुछ कहना है

उस मीटिंग से बाहर आए, तो हल्का सिरदर्द हो रहा था। वह कुछ कहना चाहते थे, लेकिन कह नहीं पाए। मन मसोसकर रह गए। बाद में उन्हें लगा कि वह बात करनी जरूरी थी। हम अपनी बात कहते-कहते क्यों अटक जाते हैं? डॉ. सूजन मैकिलन कहती हैं, ‘हमें हर हाल में अपनी बात कहनी चाहिए। हम क्या महसूस करते हैं, उसे तो कम से कम जताना जरूरी है।’ वह मशहूर न्यूट्रीशनिस्ट हैं। उनकी किताब ब्रेकिंग द बॉन्ड्स ऑफ फूड एडिक्शन  खासा सराही गई है। अगर हमें लगता है कि हम सही हैं। तब हमें अपनी बात कहने से हिचकना नहीं चाहिए। ऐसा अक्सर होता है कि हम कुछ महसूस करते हैं। वह सही भी होता है। लेकिन हम उसे कहने में चूक जाते हैं। हमारे भीतर एक उलझन चलती रहती है। हम कुछ कहना चाहते हैं। लेकिन अपनी बात दिल से बाहर नहीं कर पाते। कभी-कभी तो उसका बड़ा भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

अगर हम कहीं अपनी बात कह नहीं पाए हैं, तो हमें उसके बारे में सोच-विचार करना चाहिए। कभी ऐसा हो सकता है कि उसकी वजह से तमाम तरह की गलतफहमियां हो जाएं। ये गलतफहमियां हमें दिक्कत पहुंचा सकती हैं। इसीलिए जरूरी है कि हम अपनी उस कमी पर सोचें। उसे दूर करने की कोशिश करें। हमें अपनी बात जरूर कहनी चाहिए। यही नहीं हमें अपनी बात आराम से कहनी चाहिए। मुझे लगता है। या मुझे महसूस होता है। इस तरह से हम जब अपनी बात कहते हैं, तो दूसरे पर बेवजह का दबाव नहीं बनाते। फिर हम बिना बात ही फैसला देने से बच जाते हैं। यह ठीक है कि हमें अपनी बात कहनी चाहिए। लेकिन उसे कहते हुए किसी दूसरे की बात को सिरे से नकारना नहीं चाहिए। किसी को कमतर दिखाकर भी बात नहीं करनी चाहिए। बस अपनी बात पर जोर होना चाहिए।

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