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इलाहाबाद में निराला

निराला की देह एक विशाल पुरुष-देह की तरह आसमान तक खींची लगती थी। पैर जमीन पर और मस्तक आसमान में, लेकिन यह उनका एक पक्ष है। भीतरी तौर पर वह एक कोमल स्त्री की तरह थे, जो नदी में छलांग लगाकर गहरे डूब गई है। कविता और गीत का अद्भुत संतुलन निराला में था, जो बाद में कई तरह से जीवन-असंतुलन में बदल भी गया। निराला की कविताएं इस तरह समाज की मीनारों और उसके ध्वंस से उत्पन्न होती हैं, उसमें गुनाहों के देवता का रूमानी उच्छ्वास नहीं है। निराला से हम बहुत डरते थे। हम उनके पास कम जाते थे और सहमकर जाते थे। हमारे कई गहरे दोस्त थे, जो नाव चलाते थे, गंगा नहाते थे, जलेबी खाते थे और निरालाजी के पड़ोसी थे। उन्हीं के साथ हमारी हिम्मत पड़ती थी।

निराला के सामने स्टूल पर एक बड़ा प्याला होता था, जिसे प्याला नहीं चषक कहना चाहिए। अंतिम सालों में ही मैं उनसे तीन-चार बार मिला। एक बार उन्होंने हमारी कैम्पस पत्रिका के लिए एक कहानी हिंदी और अंग्रेजी में मिली-जुली जीटीवी की खबरों की तरह डिक्टेट की। स्व बद्रीनाथ तिवारी हमारे साथ थे। इस बात को किसी नारे के रूप में न लिया जाए कि निराला की विशाल पीठ के पीछे एक चीड़ के खोखलनुमा रैक में तीन किताबें हुआ करती थीं। एक रामचरितमानस, एक मार्क्स की दास कैपिटल  और शेक्सपियर का एक खंड। निराला के भीतरी तहखानों में जाना और निकल आना एक असंभव काम है। वहां भटकते-भटकते गुम जाने और मर जाने तक की नौबत हो सकती है।
कबाड़खाना ब्लॉग से

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