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जयापुर से आगे

सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गांवों को अपनाने का काम पिछले कुछ समय से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। लेकिन शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के गांव जयापुर को इस योजना के तहत अपनाने की घोषणा की, उससे इस कार्यक्रम में तेजी आना लगभग तय है। प्रधानमंत्री ने न सिर्फ जयापुर जाकर उसे अपनाने की घोषणा की, बल्कि गांव के विकास को लेकर जो दिलचस्पी दिखाई, वह बाकी सांसदों के लिए अनुकरणीय हो सकती है। वैसे आदर्श ग्राम योजना का मकसद भी यही है कि कुछ गांवों को एक आदर्श के रूप में तैयार किया जाए, ताकि बाकी गांव उनके जैसा बनने की कोशिश करें, या कम से कम उनके जैसा बनने की आकांक्षा तो पाले हीं। लेकिन आमतौर पर ऐसी योजनाएं या तो औपचारिकता निभाने तक सीमित रह जाती हैं, या उनके लिए दिए गए सरकारी संसाधनों की बंदरबांट करते हुए मूल लक्ष्य को ही दरकिनार कर देती हैं।

ऐसे में, प्रधानमंत्री की निजी दिलचस्पी इस सूरत को बदल सकती है। इससे प्रशासन और सांसदों पर नतीजे देने का दबाव तो बनेगा ही। इस बार की योजना में एक अच्छी चीज यह है कि इसके लिए अलग से धन का प्रावधान नहीं किया गया है और संसद सदस्यों को अपनी सांसद निधि से इसे अंजाम देना होगा। यानी इस कार्यक्रम को अमल में लाने के लिए संसद सदस्यों को निजी स्तर पर इसमें भागीदार बनना ही होगा। यह योजना ग्रामीण विकास में एक नया आयाम जोड़ सकती है। अभी तक ग्रामीण और शहरी, सभी क्षेत्रों के विकास के बारे में ज्यादातर सोच यही रही है कि केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाएंगी। इसके लिए पंचवर्षीय योजना से लेकर सालाना बजट और मंत्रिमंडलीय प्राथमिकताओं में ढेर सारे प्रावधान किए जाते हैं।

बहुत सारा धन इस मद में खर्च किया जाता है। यह बात अलग है कि इसमें से बहुत सारा धन वहां तक पहुंचता ही नहीं, और जो पहुंचता भी है, उससे जन-जीवन में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। इसका कारण एक तो भ्रष्टाचार माना जाता है और दूसरा यह कि ऊपर से बनकर आई बहुत-सी योजनाएं उन लोगों के लिए किसी काम की नहीं होतीं, जिनके लिए उन्हें बनाया गया है। मौजूदा योजना इस सोच से अलग है। इसमें एक गांव को चुना जाएगा और उम्मीद है कि उसकी जरूरत के हिसाब से उसके लिए योजनाएं बनेंगी। एक उम्मीद यह भी है कि इससे जन-प्रतिनिधियों को यह अनुभव भी मिलेगा कि गांवों की असल जरूरत क्या है और वहां किसी योजना को लागू करने में क्या कठिनाइयां सामने आती हैं। बेशक, देश की पूरी जरूरत को देखते हुए यह योजना पहली नजर में ऊंट के मुंह में जीरे की तरह लगती है। अगर हर संसद सदस्य हर साल एक गांव को आदर्श बनाने की कोशिश करता है, तब भी तीन साल में इन आदर्श गांवों की संख्या ढाई हजार से कम होगी, जबकि देश में छह लाख से अधिक गांव हैं और यहां की 69 फीसदी आबादी इन गांवों में रहती है।

यह जरूर है कि इन आदर्श गांवों का विस्तार देश के तकरीबन हर जिले और हर संसदीय क्षेत्र में होगा। ऐसे में, संसदीय क्षेत्र विकास निधि से गांव में तरह-तरह की सुविधाएं बना देने की बजाय विकास का ऐसा मॉडल पेश करना जरूरी है कि आस-पास के गांव उसका अनुकरण कर सकें और खुद अपने ही संसाधनों से अपने पिछड़ेपन से मुक्ति पा सकें। हमें पिछड़ेपन से मुक्ति की सरकारी योजना की नहीं, इसकी जन-आकांक्षा की जरूरत है। प्रधानमंत्री की सक्रिय दिलचस्पी इसकी उम्मीद बंधाती है, आदर्श ग्राम बनाने की यह पहल एक आंदोलन की तरह आगे बढ़ सकती है।

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