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कहां गया लोकपाल

अरविंद केजरीवाल ने यूपीए सरकार को लोकपाल के गठन के लिए पानी पिला दिया। सरकार उनके आंदोलन और लोगों की इच्छाओं के आगे झुकी भी। कानून भी बना। नई सरकार को भी छह महीने होने को आए, मगर आज तक लोकपाल नदारद है। क्यों? आखिर अन्ना और अरविंद इस मसले पर चुप क्यों हैं? कहीं नई सरकार पूंजीपतियों के दबाव में तो इस नियुक्ति को लटका नहीं रही? अब धीरे-धीरे सबकी कलई खुल रही है।
दीपक सहवाग, पालम गांव, दिल्ली

शहीदों की उपेक्षा

अलग झारखंड राज्य का गठन हुए 14 वर्ष पूरे होने को हैं। 14 वर्ष पहले जन्मे बच्चे भी अब किशोरवय के हो चुके हैं। इन 14 वर्षों में बहुत कुछ बदला, मगर अलग झारखंड की लड़ाई लड़ने वाले तमाम शहीदों और आंदोलनकारियों की हसरतें उपेक्षा का शिकार होकर रह गईं। आंदोलनकारी और शहीदों के परिजन खुद को ठगा हुआ महसूस करके अवसादग्रस्त हो चुके हैं। एक समय खेती-बाड़ी, सरकारी नौकरी, वकालत, व्यवसाय छोड़कर झारखंड आंदोलन में कूदने वाले कई लोगों से मैंने बात की, तो वे फूट पड़े। पुलिस-प्रशासन से बचते हुए कई-कई रात खेतों में भूखे-प्यासे गुजारने वाले आज अपने सपनों के झारखंड में हाशिये पर धकेले जा चुके हैं। लोक-कल्याणकारी होने का दंभ भरने वाली सरकार अपने सपूतों को अभी तक वह सम्मान नहीं दे सकी, जिसके वे हकदार थे। कायदे से यह पुनीत कार्य राज्य गठन के दो वर्ष के भीतर हो जाना चाहिए था। बहरहाल, जब जागे, तभी सबेरा मानकर सरकार इस पुनीत कार्य को जल्दी से जल्दी संपन्न करे। झारखंड आंदोलन में अपना सब कुछ निछावर करने वाले भुलाए नहीं जा सकते।
महादेव महतो, तालगड़िया

प्रधानमंत्री किसका

हमारे देश की सांविधानिक व्यवस्था के अनुसार, प्रधानमंत्री चुने जाने से पहले एक व्यक्ति किसी पार्टी का नुमाइंदा हो सकता है, मगर जैसे ही वह व्यक्ति इस पद पर बैठता है, वह दल या पार्टी का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि समस्त देशवासियों का प्रतिनिधि हो जाता है। प्रधानमंत्री और अपनी सरकार से लोगों की बहुत सारी उम्मीदें बंधी होती हैं। ऐसे में, क्या प्रधानमंत्री को किसी पार्टी या गठबंधन से ऊपर उठकर नहीं सोचना चाहिए। क्या एक प्रधानमंत्री का चुनावी दौरा पद की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाता है? दलीय राजनीति में हर दल की एक संगठनात्मक संरचना होती है। नीतियों और विचारधाराओं को लोगों के सामने रखना या चुनावी रणनीति तैयार करना संगठन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में, चुनावी मंच से प्रधानमंत्री द्वारा किसी राज्य की चुनी हुई सरकार के कार्यों या उनकी नीतियों की आलोचना करना क्या उचित है? राज्यों में होने वाले चुनाव के बीच आकाशवाणी से ‘मन की बात’ करना या सोशल मीडिया पर सरकारी योजनाएं व उपलब्धियां गिनाना क्या चुनाव प्रभावित नहीं करता? दलीलें बहुत हो सकती हैं, मगर इस विषय पर विमर्श की आवश्कता है।
एम के मिश्र, मां आनंदमयी नगर, रातू, रांची

प्रशासनिक सुधार जरूरी

आजादी के बाद हमारे देश में अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई लोक प्रशासन की व्यवस्था को जारी रखने का निर्णय लिया गया। अंग्रेजों ने अपने प्रशासनिक तंत्र में रिश्वतखोरी की जो व्यवस्था विकसित की थी, वह आज भी बदस्तूर जारी है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें आर्थिक संसाधनों से संपन्न भौतिकतावादी विचारधारा के लोग नैतिकता के प्रतिकूल व्यवहार करते हैं। उपहार तथा सुविधा शुल्क आदि द्वारा उच्च वर्ग का अधिकारियों से संपर्क करना तथा अपना निजी स्वार्थ साधने की प्रथा अंग्रेजों की ही देन है। गोपनीयता के नाम पर आम आदमी को सूचना से वंचित रखने की प्रथा हमारी व्यवस्था में वर्षों तक जारी रही है। राजनीति की स्वार्थपरक नीतियों के कारण भारतीय नौकरशाही का नैतिक पतन हुआ। अब जरूरत नौकरशाही को जनता के हितों से जोड़ने की है, ताकि वह जन-सेवा को अपना धर्म समझे।
कुंदन सिंह ‘संगम’, ढक्का, अमरोहा

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