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उपन्यास पर बनी फिल्म है, रवि वर्मा की जीवनी नहीं

उपन्यास पर बनी फिल्म है, रवि वर्मा की जीवनी नहीं

कभी ‘भवानी भवाई’, ‘होली’, ‘मिर्च मसाला’, ‘हीरो हीरालाल’ जैसी फिल्में निर्देशित कर केतन मेहता एक बेहद संभावनाशील निर्देशक के तौर पर सामने आए थे, मगर 2005 के बाद उनकी रफ्तार बहुत सुस्त हो गई। लंबे समय बाद वह एक बार फिर ‘रंग रसिया’ लेकर हाजिर हुए हैं। उनसे हुई ताजा बातचीत

यह फिल्म तो निर्माण के समय से ही चर्चा में आ गई थी, फिर इतनी देर क्यों?
मुझे इस बात का अफसोस है कि 2008 में पूरी होने के बावजूद यह अब रिलीज हो पाई है। कुछ छोटी-मोटी फाइनेंशियल प्रॉब्लम्स के अलावा सेंसर बोर्ड भी इसके लिए जिम्मेदार है। बोर्ड ने बोल्ड दृश्यों का हवाला देकर इसे काफी दिनों तक लटकाए रखा, जबकि फिल्म में वे दृश्य बहुत जरूरी थे। फिर फिल्म के सब्जेक्ट पर भी उन्हें आपत्ति थी। खैर धीरे-धीरे हमने सारी समस्याएं सुलझा लीं। इन्हीं कारणों से रिलीज होने में कुछ ज्यादा ही वक्त लग गया।

इतनी बोल्ड फिल्म क्यों?
हम आधुनिक कला के जनक राजा रवि वर्मा पर आधारित फिल्म बना रहे थे। सौंदर्य को चित्रित करने के लिए वे किस-किस तरह की कोशिशें करते थे, इससे कम ही लोग वाकिफ हैं। इसलिए इस तरह की फिल्म बनाई। मगर इसका दूसरा सच यह है कि इसके बाद ही एक अद्भुत पेंटिंग सामने आती थी।

मगर इस देर की वजह से फिल्म का क्रेज कम हुआ है?

मैं ऐसा नहीं मानता, बल्कि मेरा ख्याल है कि फिल्म  रिलीज होने का सबसे अच्छा वक्त यही हो सकता था। आज ऐसी कलात्मक फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग तैयार हुआ है। ऐसी फिल्में भी खूब पसंद की जा रही हैं।

ये सब्जेक्ट किन कारणों से चुना?
मुझे राजा रवि वर्मा की कलात्मकता ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। इसी के साथ उनके पूरे जीवन-वृत्त में चित्रण की भरपूर गुंजाइश थी। उनका जीवन दर्शन भी अद्भुत था। उन्होंने अपनी बनाई पेटिंग वितरित की। भला सोचिए, क्या आज कोई पेंटर अपनी करोड़ों की पेंटिंग मुफ्त बांट सकता है!

आप राजा रवि वर्मा के किरदार से बहुत प्रभावित लगते हैं?
इसमें कोई शक नहीं। उनके जीवन के इतने शेड्स हैं कि लोग आज भी उनकी चर्चा करते हैं। उन्होंने लक्ष्मी, सरस्वती जैसे हमारे देव-देवताओं के चेहरों को सृजन का रंग दिया। करोड़ों श्रद्धालुओं के जेहन में यही चेहरे हैं। ऐसे किरदार ही तो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।

पर फिल्म से विवाद भी जुड़ने लगे।
ऐसा होना तो नहीं चाहिए, क्योंकि मैंने कभी ऐसा नहीं कहा कि मेरी ये फिल्म सच्ची कहानी पर आधारित है। मैंने यह फिल्म रंजीत देसाई के उपन्यास राजा रवि वर्मा पर बनाई है। वह महान पेंटर थे, इसी बात पर मेरा फोकस ज्यादा था।

फिल्म में सितारे नहीं हैं?
इसकी जरूरत महसूस नहीं की। असल में मैं यह फिल्म कम समय में पूरी करना चाहता था, ताकि जल्दी रिलीज हो सके और मैंने वह किया भी। ये अलग बात है कि दूसरे मसलों की वजह से फिल्म लंबे समय तक लटक गई। बड़े सितारों के साथ डेट प्रॉब्लम हो सकती थी, इसलिए रणदीप हुड्डा और नंदना सेन को लिया। दोनों ही उम्दा कलाकार हैं। रणदीप तो खुद को साबित कर चुके हैं। जहां तक नंदना का सवाल है तो उनका चयन इसलिए नहीं किया कि वह नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की बेटी हैं। वह तब भी अच्छी अभिनेत्री थीं, आज भी हैं। फिल्म देखने के बाद सबको इसका यकीन हो जायेगा।

शुरुआती दौर की तुलना में आपकी बाद की फिल्मों को सराहना नहीं मिली?
मैं मानता हूं कि पिछले वर्षों में ‘ओह डार्लिंग ये है इंडिया’, ‘आर या पार’ और ‘मंगल पांडे’ जैसी मेरी फिल्में दर्शकों को संतुष्ट नहीं कर पाईं। खास तौर से ‘मंगल पांडे’ को लेकर मुझे आज भी अफसोस है, लेकिन इस दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन पर ‘सरदार’ बना कर मुझे बहुत मजा आया।

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