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अब सेहत आपकी जेब में

एक कॉरपोरेट कंपनी में एग्जीक्यूटिव के पद पर तैनात रजत अरोड़ा को तीन महीने पहले पता चला कि उसे एंजाइना है। खून में लगातार एचडीएल की मात्रा बढ़ रही है और वह चाह कर भी कुछ कर नहीं पा रहा।  व्यायाम करने की सलाह के साथ-साथ आहार विशेषज्ञ ने उसे एक डाइट चार्ट बना कर दिया, जिससे वह अपनी रोजाना ली जाने वाली कैलोरी व वसा पर नियंत्रण रख सके।

साथ ही यह भी कहा कि उसके लिए अपनी सेहत की नियमित मॉनिटरिंग करना जरूरी है और हफ्ते में एक बार चिकित्सक से परामर्श लेना भी अनिवार्य है। रजत की इस समस्या का समाधान एक डिवाइस ने किया, जिसकी बदौलत वह पॉकेट में रखे एक उपकरण की मदद से अपनी ईसीजी जांच कर सकता है, साथ ही पेडोमीटर से अपनी कैलोरी को हर कदम पर गिन सकता है। 

यह तो थी रजत की समस्या, जिसका समाधान भी उसे जल्द ही मिल गया, लेकिन सेहत और उससे जुड़े कई पहलुओं पर हम ध्यान ही नहीं दे पाते या फिर तब ध्यान देते हैं, जब बहुत देर हो जाती है।

कॉरपोरेट कंपनियों ने अपनी कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ने के लिए आजकल प्रीवेंटिंग हेल्थ चेकअप पर ध्यान देना शुरू कर दिया है, जिससे बीमारी से पहले ही उससे बचाव के उपाय अपनाए जा सकें। इसी क्रम में कुछ जरूरी तकनीकी उपकरणों ने हमारी आम दिनचर्या में जगह बना ली है।

इस समय बाजार में तकनीक की मदद से सेहत पर नजर रखने वाले करीब 15 से 20 उपकरण मौजूद हैं, जिन्हें चिकित्सक की सलाह के बाद इस्तेमाल किया जा सकता है।

पेडोमीटर
मधुमेह के मरीज सबसे अधिक पेडोमीटर डिवाइस का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके जरिए वह अपनी तमाम तरह की गतिविधियों में खर्च होने वाली कैलोरीज की जांच खुद कर सकते हैं, साथ ही जरूरी कैलोरी के आधार पर व्यायाम भी कर सकते हैं।  पेजर जैसे आकार  की इस डिवाइस को कमर की बेल्ट में बांधा जाता है। हालांकि कई पेडोमीटर घड़ी या फिर अंगूठी के आकार के भी होते है, जिन्हें केवल त्वचा के संपर्क में लाने पर सेंसर के जरिए कैलोरी की मात्रा स्क्रीन पर दिखने लगती है।

हेल्थ मॉनिटर ऐट होम
टैबलेट की तरह की हेल्थ फ्रेंडली होम डिवाइस को घर के कोने में लगाया जाता है। सेंसर और एक सॉफ्टवेयर के जरिए इसे घर की हर उस जगह से जोडम जाता है, जहां लोगों का आना-जाना अधिक होता है। जिसकी मॉनिटरिंग करनी होती है, उसकी जानकारी डिवाइस में पहले ही फीड कर दी जाती है। इसके जरिए पल्स रेट, ग्लूकोज के स्तर और ईसीजी की मॉनिटरिंग डिवाइस पर हर दो घंटे में आती रहती है।

यह सॉफ्टवेयर फैमिली डॉक्टर के पोर्टल से जुड़ा जाता है, जो अपने क्लीनिक में बैठ कर मरीज की सेहत का जायजा लेता रहता है।

ईएचआर
इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड के जरिए मरीज के स्वास्थ्य संबंधी सभी जरूरी पैरामीटर डॉक्टर तक पहुंच जाते हैं। इसमें मरीज को दस इंच की डिवाइस को हफ्ते में एक बार प्रयोग करना पड़ता है। इसमें मशीन पर उंगली के जरिए दिल की धड़कन व सीटी सहित अल्ट्रासाउंड की इमेज चिकित्सक को मिल जाती है। इस तकनीक में व्यक्ति की त्वचा की संवेदना को मशीन में ग्राफिक्स के रूप में तब्दील कर दिया जाता है।

मशीन एक बार में 20 से 50 सेकेंड में जरूरी पैरामीटर जैसे ब्रीदिंग, ब्लड और सर्कुलेशन की जानकारी
देती है।

सीओपीडी ट्रेकर
डिवाइस का इस्तेमाल सांस से जुडम्ी तकलीफ में भी होता है। दिल्ली के पटेल चेस्ट इंस्टीटय़ूट के फेफडम एवं छाती विभाग के प्रमुख डॉ. राजकुमार ने बताया कि वायु प्रदूषण से लोग सांस संबंधी तकलीफ के शिकार हो रहे हैं, जिन्हें सीधे अस्थमा के मरीज न मान कर क्रॉनिक ऑब्सिटकल पल्मोनरी डिसीज (सीओपीडी) के रोगी कहा जाता है। ऐसे मरीजों के इन्हेलर में एक डिवाइस लगाई जाती है, जिसे एंड्रॉयड से जोड़ फेफड़े की मॉनिटरिंग की जाती है। मरीज के डिवाइस की मॉनिटरिंग चिकित्सक भी पीसी पर कर सकते हैं।

मेडिसिन रिकॉलर
इसमें बेहद कम खर्च वाले एक दो इंच के कैप्सूल के जरिये मरीज को इसका ध्यान दिलाया जाता है कि उसे कब दवाएं लेनी हैं। कैप्सूल से जुडम्े मॉनिटर को मरीज के हाथ पर लगी एक डिवाइस से सेंसर की मदद द्वारा जोडम जाता है, जो दवा लेने के समय पर अलार्म बजाता है। इसमें दवाएं लेने का टाइम फीड करना होता है। बिजनेस से जुड़े या फिर नौकरीपेशा बीमार लोग इस डिवाइस को अधिक कारगर मानते हैं।

ग्लूकोमीटर
कुछ समय पहले आई एक तकनीक  ग्लूकोज पर रख रही है नजर। इसने डायबिटीज के मरीजों को काफी राहत पहुंचाई है। अमेरिका में ईजाद की गई यह तकनीक आम भारतीयों की दिनचर्या में भी शामिल हो गई है। डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. अनूप मिश्रा कहते हैं कि सेहत की प्रमुख डिवाइसेज में ग्लूकोमीटर को काफी पसंद किया जा रहा है। अब मधुमेह रोगी आसानी से अपने ब्लड ग्लूकोज का खुद पता लगा लेते हैं। इसी क्रम में पेन इंसुलिन डिवाइस भी अहम है, जिसमें इंजेक्शन की जगह एक पेन से इंसुलिन को शरीर में पहुंचाया जा सकता है।

कॉन्टेक्ट लेंस लगाते हैं?
जरूरी है सावधानी
भारत में कॉन्टेक्ट लेंस को आए लगभग तीन दशक हो  चुके हैं।  उसके बाद से हार्ड लेंस, सॉफ्ट लेंस,  डिस्पोजेबल लेंस  और अब कलरफुल लेंस के कई रूप देखने को मिल चुके हैं। पर बात जब वरीयता की आती है तो  विशेषज्ञ लेंस की जगह चश्मे के ही इस्तेमाल  पर जोर देते हैं, जिसकी वजह है सफाई का ध्यान न रखने पर आंखों में होने वाले संक्रमण की आशंका।

कॉन्टेक्ट लेंस के फायदे
व्यक्ति की लुक में अंतर आता है। कई बार विशेषज्ञ अधिक पावर का चश्मा पहनने वालों को भी लेंस की सलाह देते हैं। कारण, कांच के ऊपर चित्र की बड़ी तस्वीर बनने से कई बार आंखों को केंद्र में रखना मुश्किल होता है। उस स्थिति में भी लेंस की सलाह दी जाती है, जब दोनों आंखों की पावर में अंतर होता है।

यूं रखें ध्यान
कॉन्टेक्ट लेंस को सॉल्यूशन में डुबो कर रखें।
लेंस को साफ करने के बाद गीला न छोड़ें, क्योंकि नमी में बैक्टीरिया के पनपने का खतरा रहता है। सफाई हर दिन करें। लेंस की सफाई न होने से कॉर्निया से आंखों में बैक्टीरिया जा सकते हैं। इस स्थिति में आंखों में गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकता है।

इसे आंखों में लगाने और निकालने से पहले हाथों को धोकर उन्हें अच्छी तरह सुखा लें। इससे संक्रमण का खतरा नहीं रहेगा। इसे नाखून से न पकड़ें। लेंस पर स्क्रेच पडम् सकता है। नाखून से आंखों की पुतली को भी नुकसान पहुंच सकता है।

कॉन्टेक्ट लेंस को कुर्सी या स्टूल पर बैठ कर पैरों पर साफ तौलिया या कपड़ा डाल कर लगाना चाहिए। इससे यदि कॉन्टेक्ट लेंस गिरता भी है तो कपड़ा पर ही गिरेगा।

कॉन्टेक्ट लेंस पहन कर चेहरा न धोएं, क्योंकि पानी में एक प्रकार का बैक्टीरिया पाया जाता है, जिससे इंफेक्शन का खतरा रहता है। यह गंभीर हो सकता है।

तैराकी में, बाइक चलाते वक्त या तेज आंधी में कॉन्टेक्ट लेंस का इस्तेमाल न करें। इससे लेंस पर स्क्रेच आ सकते हैं।

सोते समय लेंस  निकाल दें, क्योंकि जब हम जाग रहे होते हैं तो हमारी आंखें वातावरण से ऑक्सीजन लेती हैं, जबकि सोते समय आंखें पलकों के ऊतकों से ऑक्सीजन ग्रहण करती हैं। कॉन्टेक्ट लेंस के इस्तेमाल के समय यदि आंखें बंद हुईं तो उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।

कॉन्टेक्ट लेंस निकालने के बाद यदि सिरदर्द, आंखों में दर्द या खुजली होती है तो लेंस का उपयोग बंद कर डॉक्टर की सलाह लें। यह शरीर के दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित कर सकता है। 

जब तक लेंस लगाने की सलाह दी गई है, उसे तब तक ही लगाएं। तय समय के बाद इसके इस्तेमाल से आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। लेंस केस को भी हर तीन महीने में बदल देना चाहिए।

विशेषज्ञ की सलाह के बगैर किसी क्लीनर  का इस्तेमाल न करें।

लेंस को कॉस्मेटिक लोशन, क्रीम या स्प्रे के संपर्क में कतई न आने दें।

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