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फिर तीसरा मोर्चा

गैर भाजपा-गैर कांग्रेसी पार्टियों के नेताओं की दिल्ली में मुलाकात से तीसरे मोर्चे की चर्चा फिर शुरू हो गई है। इस पहल में दो नई बातें हैं। पहली यह कि वाम दल इसमें शामिल नहीं हैं और दूसरी, बात मोर्चे से उठकर एक पार्टी बनाने की हो रही है। चाहे उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी हो या बिहार की जनता दल (यू) और राष्ट्रीय जनता दल या कर्नाटक की जनता दल (सेक्युलर) ये सभी पार्टियां जनता दल से ही निकली हैं। अगर वे एक हो जाती हैं, तो इन पार्टियों के नेताओं की यह घर वापसी होगी। मगर यह इतना आसान नहीं है, न ही जल्दी होने वाला है। इन नेताओं ने तय किया है कि अब से संसद में उनकी पार्टियां एक समूह की तरह काम करेंगी। लोकसभा में तो इन पार्टियों के सांसदों की कुल तादाद 15 है और उनका बहुत असर नहीं होगा, लेकिन राज्यसभा में इनके कुल मिलाकर 25 सांसद हो जाते हैं। राज्यसभा में भाजपा को बहुमत हासिल नहीं है, इसलिए ये 25 सांसद काफी प्रभावशाली हो सकते हैं।

जनता दल के साझा इतिहास के अलावा इन नेताओं के लिए एक वर्तमान भी साझा है। इनके राज्यों में भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में बहुत प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। हालांकि मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार की पार्टियों की अपने-अपने राज्य में सरकारें हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में इन्हें गिनती की सीटें मिली हैं। एचडी देवेगौड़ा कर्नाटक के बहुत अनुभवी जमीनी नेता होने के बावजूद अपने राज्य में लगभग अप्रासंगिक हो गए हैं। बिहार में इसी परिस्थिति ने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव जैसे धुर विरोधी नेताओं को साथ ला दिया। यह प्रयोग इस मायने में सफल रहा कि जनता दल (यू) की सरकार भी राज्य में बनी रही और उपचुनावों में इस सहयोग की वजह से अच्छे नतीजे आए। ये पार्टियां अपने-अपने राज्य तक सिमटी हुई हैं, इसलिए एक-दूसरे के राज्य में इनका कोई स्वार्थ नहीं हैं। ये सभी एक नेता के इर्द-गिर्द बनी हुई पार्टियां हैं और राष्ट्रीय राजनीति में इनके हित जरूर टकराते थे। फिलहाल राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा से ज्यादा इन्हें अपना वजूद व प्रभाव बनाए रखने की फिक्र है, इसलिए ये साथ आ सकते हैं। फिर गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इतना खराब रहा है कि वह भाजपा विरोधी दूसरे गठबंधन की धुरी बनने की हालत में भी नहीं है। भारत की राजनीति पिछले करीब 15 साल से कांग्रेस और भाजपा के इर्द-गिर्द बने गठबंधनों पर आधारित रही है। बाकी पार्टियां इस या उस गठबंधन के साथ हो जाती थीं। चुनावों के वक्त जरूर तीसरे मोर्चे को खडम किया जाता था, लेकिन पिछले तीन लोकसभा चुनाव में दोनों बड़ी पार्टियों को इतनी सीटें मिली थीं कि अन्य पार्टियों के पास किसी गठबंधन में मिलने का ही विकल्प बचता था।

अब, भाजपा को गठबंधन की जरूरत नहीं है और कांग्रेस के पास ताकत नहीं है। भाजपा की महत्वाकांक्षा भी छोटी पार्टियों पर अपनी निर्भरता खत्म करने की है। ऐसे में, भाजपा के खिलाफ विपक्ष की जगह खाली है। हो सकता है कि कल हरियाणा की इनेलो और हजकां इस समूह में शामिल हो जाएं, कभी अकाली दल को भी यहां आना पड़े। कांग्रेस के फिर से मजबूत होने की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही, इस बीच जहां भी विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां कांग्रेस की कोई संभावना नहीं दिखती। ऐसी राजनीति में कई सवाल खड़े होते हैं और कई दिलचस्प संभावनाएं भी हैं। तीसरे मोर्चे के अनुभव अब तक जैसे भी रहे हों, लेकिन इन नेताओं का अपने-अपने राज्यों में जनाधार तो है ही, इसलिए साथ आने का उनका यह प्रयोग अगर चला तो दिलचस्प हो सकता है।

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