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आवाज की दुनिया में मन की बात

‘देश की सुरीली धड़कन’ होने का दावा करने वाले ऑल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी की संचार की अकूत शक्ति देश के 98 प्रतिशत हिस्सों तक इसकी तरंगों की पहुंच से सिर्फ नहीं आंकी जा सकती। लगभग नौ दशकों का उतार-चढ़ाव भरा इतिहास अपने दामन में समेटे भारतीय रेडियो को दो दशक पहले ‘मृतप्राय’ मानने वालों की तादाद कम न थी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात’ के दो प्रसारणों से अब यह धुंध छंटने लगी है। इसे नया जीवन मिला है और एक नई उम्मीद जगी है। मीडियम और शार्टवेव प्रसारणों के जरिए देश के कोने-कोने तक पहुंचने और दुनियां का सबसे ऊंचा प्रसारण टावर लद्दाख में स्थापित करने के बाद एफएम तकनीक के माध्यम से नया जीवनदान प्राप्त कर चुके भारतीय रेडियो के इतिहास में एक न, अध्याय के रूप में ‘मन की बात’ के प्रसारण का आकलन किया जाना अनुचित और बेमानी नहीं।

प्रधानमंत्री ने इस श्रव्य माध्यम की जवाबदेही को आमजन से सीधे संवाद के लिए चुनकर रेडियो पर जो विश्वास व्यक्त किया, वह अभूतपूर्व है। वैसे अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा व्हाइट हाउस में बने रेडियो स्टूडियो से प्राय: हर शनिवार को देश के लोगों को सीधे संबोधित करते हैं। भारत में भी आकाशवाणी का सशक्त संवाद माध्यम के रुप में लगभग सभी प्रधानमंत्रियों ने समय-समय पर ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ के माध्यम से उपयोग किया। आजादी की ऐतिहासिक 14-15 अगस्त की रात प्रधानमंत्री (मनोनीत) जवाहर लाल नेहरू का भाषण, गांधी जी के निधन पर- ‘द लाइट इज गन’ कहते हुए नेहरू जी का राष्ट्र को संबोधन, स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के राष्ट्र के नाम संबोधन के रेडियो-जैसे प्रसारण की तो पुरानी परम्परा रही। बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स की समाप्ति, बांग्लादेश युद्ध और जून 1975 में देश में आपात स्थिति के समय प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम पहला संबोधन रेडियो के जरिये ही लोगों तक पहुंचा। देश को आपातकाल की पहली सूचना, महात्मा गांधी की हत्या की पहली विश्वसनीय सूचना रेडियो से ही मिली। आकाशवाणी पर ‘पंचों राम-राम’ का संबोधन और कार्यक्रम देश में कृषि योजनाओं की सफलता का बहुत बड़ा आधार बना। कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सरकार को और बीबीसी से आए प्रथम डायरेक्टर जनरल लायनेल फील्डेन को आल इंडिया रेडियो का हिन्दी नाम ‘आकाशवाणी’ दिया।
 
प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ ने रेडियो को बहुत पुराने दौर में पहुंचा दिया है। रेडियो सिलोन से प्रसारित साप्ताहिक बिनाका गीतमाला के दौर में। चीन-पाक युद्ध के दौर में भोजपुरी नाटक ‘लोहा सिंह’ के रामेश्वर सिंह की यादें पुरनियों के जेहन में हैं। यह रेडियो नाटक पटना केन्द्र से प्रसारित होता था। इसे सम्पूर्ण हिन्दी क्षेत्र में भारी लोकप्रियता मिली थी। बिहार के ‘झुमरी तलैया’ गंवई-कस्बे से लोग रेडियो के पसंदीदा-फरमाइशी कार्यक्रमों की फरमाइश करने वालों के कारण परिचित हुए। क्रिकेट की रेडियो कमेंट्री ने रेडियो की लोकप्रियता को एक नया आयाम दिया। उस जमाने में रेडियो की लाइसेंस फीस जमा कर भी लोग रेडियो सुनने को बेताब रहते थे।
आवाज की दुनियां के इस लंबे सफर में देवकीनंदन पांडेय, अशोक वाजपेयी, मेलविल डिमेलो, जसदेव सिंह, रामानुज प्रसाद सिंह, रामेश्वर सिंह काश्यप, लोचिका रत्नम, सुरजीत सेन जैसे अनेक प्रसारकों की पहचान ने इस माध्यम की साख और पैठ बढ़ाई। रेडियो इतिहास के इन कुछ चुनिंदा नामों में एक नाम और जुड़ गया- नरेन्द्र दामोदरभाई मोदी।

गांवों में तो आज भी रेडियो सूचना और मनोरंजन का माध्यम है। शिक्षा भी जनमाध्यमों का उद्देश्य है पर शिक्षा और विकास के क्षेत्र में आकाशवाणी और कुछ कम्युनिटी रेडियो ही काम कर रहे हैं। एफएम चैनल तो मनोरंजन परोसते हैं। उन्हें समाचार प्रसारण की पूरी इजाजत ही नहीं। इस तरह सूचना से भी एफएम के श्रोता वंचित ही हैं। कभी ’स्टेटस सिंबल’ रहा रेडियो घरों से गायब था।

रेडियो के विकास की दास्तां दु:खभरी भी है। इसका विस्तार रुक गया है। देश के 280 नगरों में 839 रेडियो स्टेशनों की स्थापना की तृतीय चरण की योजना 1911 से ही सरकारी स्वीकृति की बाट जोह रही। फरवरी 2015 तक यह काम पूरा कर लेने की सूचना प्रसारण मंत्री की घोषणा अभी घोषणा ही है। इस व्यवसाय में निवेश को बढमवा न मिलने से यह क्षेत्र मंदी की चपेट में है। एक अनुमान के अनुसार नए केन्द्रों के लिए नीलामी होने से पांच हजार करोड़ के निवेश, हजारों करोड़ के लाइसेंस शुल्क और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष 15 हजार रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने एक कुशल और भावी संचारकर्ता की अपनी छवि को और भी पुख्ता करते हुए अपने संबोधन में रेडियो के ग्रामर, माइक्रोफोन से संबोधनकर्ता की दोस्ती, विचारों को रेडियो के अंदाज में पिरोने, उच्चारण, शब्दो-वाक्यों के माड्यूलेशन और वाह जैसे जरूरी तत्वों का समावेश किया। इन तत्वों ने ‘मन की बात’ प्रसारण के टाइमस्लाट को प्राइमटाइम बना दिया।

रेडियो के दिन बहुरने के साथ ही एक बेहद दु:खभरी खबर भी है। जिस पर न तो ज्यादा ध्यान दिया गया है और न चिंता ही व्यक्त की गई है। यह खबर है- देश भर के, दूरदराज के शिक्षा के खर्चीले अवसरों से वंचित और ज्ञान की ललक संजोए विद्यार्थियों, बच्चे-बच्चियों के लिए होने वाले प्रसारण ‘ज्ञानवाणी’ की अकाल मौत। प्रधानमंत्री के ‘मनकी बात’ के प्रसारण के साथ-साथ ही ‘ज्ञानवाणी’ का प्रसारण बंद होना एक बेहद टीस भरा अहसास है। दोष किसे दें- इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय को या फिर आकाशवाणी को? जो भी हो ‘ज्ञानवाणी’ देश की जरूरत है। वैसे इसके कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर उठे सवालों के उत्तर-ढूंढना जहाँ जरूरी है, वहीं पहले इसके अस्तित्व की रक्षा तत्काल होनी चाहिए। देश में ज्ञान और शिक्षा के विस्तार के लिए ‘ज्ञानवाणी’ को बचाना एक अहम सवाल बन गया है।

वैसे तो मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने सुझाव मांगे हैं, पर एक अनमांगा सुझाव भी-प्रधानमंत्री के रेडियो संबोधन-सिलसिले के शीर्षक को लेकर। आजादी के पहले हिंदी पत्रकारिता के भीष्म बाबूराव विष्णु पराडकर ने ‘देशेर कथा’ बांगला पत्र का भी संपादन किया था। इस पत्र ने पूरे देश की मानसिकता बदली, आजादी के संघर्ष में कूदने का अदम्य जज्बा पैदा किया। अनेक भाषाओं में इस पत्र की सामग्री और विचारों को उद्घृत (कोट) किया गया। प्रधानमंत्री का ‘मन की बात’ कार्यक्रम भी देश के सवा सौ करोड़ लोगों के मन-मानसिकता की बात करता है और इसे सकारात्मक सोच के रूप में बदलने का प्रयास भी है। यह सिर्फ प्रधानमंत्री की बात का ही प्रसारण नहीं, यह तो जन-गण-मन की बातें करने वाला प्रसारण है। इस प्रसारण को ‘देश की बात’ नाम दिया जाय तो शायद बात ही कुछ और होगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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