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विपक्ष के पास नहीं इस राजनीति का विकल्प

भारतीय चुनावी जनतंत्र में तर्क विवेक से ज्यादा आकांक्षाएं प्रभावी हैं। यर्थाथ से ज्यादा मिथक का बोलबाला है। यह अजीब लगता है, पर सच यही है। मिथक, करिश्मा एवं आकांक्षा जागरण की शक्ति ये तीन तत्व भारतीय जनतंत्र में नायक एवं महानायक पैदा करते रहे हैं। इन तीनों ने ही मिलकर नरेन्द्र मोदी जी के नायकत्व को भी रचा है। उनके व्यक्तित्व से जुड़े अनेक मिथक यथा उनका अमेरिका में कई दिन पानी पीकर रहने से ओबामा का प्रभावित होना गुजरात के विकास का मॉडल, उनकी योग शक्ति आदि-आदि। संवाद की उनकी क्षमता व शक्ति उनके प्रभाव को निर्मित करते हैं। इसी में उनकी विजय-यात्रा की कुंजी है।

पिछले लगभग दो दशकों तक जातीय अस्मिता की आकांक्षा का राज रहा। मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, मायावती का नायकत्व जातीय अस्मिता के विस्फोट की प्रबल आकांक्षा का परिणाम रहा है। इस राजनीति में बहुत फिट न बैठने के कारण कांग्रेस ने उपेक्षितों के बीच सत्ता के संसाधनों का वितरण कर उसकी राजनीति की कोशिश की। पर वह अपनी इस राजनीति की नई भाषा विकसित करने में अक्षम रही। वह लोगों से ‘कनेक्ट’ नही विकसित कर पाई और नेहरू परिवार के करिश्मे के भरोसे बैठी रही। इस बीच भाजपा और नरेंद्र मोदी ने ‘विकास की आकांक्षा’ की एक नई राजनीति को विकसित किया। इस राजनीति का आधार सबल राष्ट्र की चाह और हिंदुत्व के त्रिकोण से जुड़ा है। इस बीच आम आदमी पार्टी ने लोगों की कई समस्याओं को तो उभारा पर समाधान नही दे पाई। नरेंद्र मोदी ने इसका विकल्प प्रस्तुत किया। ‘सेल्फी युवा’ पीढ़ी को एक सेल्फी नायक मिल गया।  
    
आकांक्षाओं की राजनीति वंचित होने के अहसास से जुड़ी होती है। इस अहसास का गहरा भाव जगाकर ही यह राजनीति की जा सकती है। लेकिन वंचित होना सिर्फ ‘अवधारणा’ नही है एक यथार्थ भी है। अवधारणा के स्तर पर इसके दूर होने का अहसास लंबे समय तक नहीं चल सकता। इसे सच में भी दूर करना होगा, नहीं तो यह राजनीति भी अपना असर वैसे ही खो देगी जैसे ‘जातीय अस्मिता की राजनीति’ ने खोया। आकांक्षाएं प्रभावहीन होने के बाबजूद अगर लंबे समय तक मुद्दा रहती हैं तो उनका चुनावी प्रभाव क्षीण हो जाता है।

समस्या विपक्ष की राजनीति के लिए है। अगर जातीय अस्मिता की राजनीति फिर प्रभावी न हो पाई और विकास की आकांक्षा का कोई ऐसा ब्लूप्रिंट जो भाजपा के वादों से ज्यादा मोहक हो विपक्ष नहीं दे पाया तो उसके लिए संभावनाएं बहुत कम हो जाएंगी। तो फिर उसकी सारी उम्मीदें एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी वोट और विपक्षी एकता जैसी पिटे-पिटाए फार्मूलों तक ही सीमित रह जाएंगी। लेकिन नरेंद्र मोदी को इसका जवाब देना अच्छी तरह से आता है, गुजरात में उन्होंने यही किया था।

     (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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