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हंसो-हंसो, और हंसो

बीचर का कहना है कि, ‘उन साथियों से सदा दूर रहो, जो जीवन में दुख भरते हैं और केवल उन्हें अपना साथी बनाओ, जो सदा आनंद में रहते हैं। जो हंस नहीं सकता, उसे आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और उसे तब तक प्रार्थना करते रहना चाहिए, जब तक उसके मुख पर मुस्कान न खिल जाए।’ लिंकन की मेज पर सदैव ही कोई न कोई हास्य रचना पड़ी रहती थी और उनका यह स्वभाव था कि जब कभी भी वह थक जाते या कोई चिंता का विषय समझ आ जाता था, तो वह उसका कोई भी एक अध्याय पढ़ लेते थे।
 
हास्य कैसा भी हो, चाहे वह बुद्घिमता से भरा हो या फिर उटपटांग, या फिर ऐसा कि आप खुलकर हंसे- इसमें से किसी भी तरह का हास्य जीवन के लिए जरूरी है। अगर यह हमें प्रसन्न हृदय बनाता है तो ऐसा हास्य किसी स्वर्गिक वरदान से कम नहीं होता।

मेसीलन का कहना है- ‘जैसे धूप वनस्पतियों के लिये लाभप्रद है, उसी प्रकार हंसी हमारे शरीर के लिए लाभप्रद है।’ स्ट्रिकलैंड तो यहां तक कहते हैं कि हास्यप्रियता के बिना हम जीवित नहीं रह सकते। संकट के समय अपने मजाक और हास्य की मदद से बहुल लोगों ने दु:ख के बादलों को छिन्न-भिन्न कर दिया।

हास्य एक आनन्द है। सुखी और प्रसन्न वही हो सकता है, जिसे आनंद ग्रहण करना आता हो। जो हर अवस्था में प्रसन्न रहता हो, वह जीवन के रहस्य को जान लेता है, वह कभी प्रतीक्षा नहीं करता कि उसके पास सुख के साधन एकत्र हो जाएं तभी वह सुखी होगा। उसे तो अपनी प्रसन्नता में, सीमित साधनों में, वर्तमान वातावरण में, हर परिस्थितियों में आधिकाधिक आनन्द प्राप्त कर लेता है। जीवन महान है और यदि हम प्रसन्न और संतुष्ट हैं तो हमें सारी प्रकृति मुस्कुराती हुई प्रतीत होगी। स्वर्ग-नरक कहीं नहीं हैं वो हमारी प्रसन्नता में ही निहित हैं।
                 

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