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खुद से लड़ते नामवर

मार्क्स से एक बार किसी पत्रकार ने पूछा था कि मार्क्सवाद क्या है? मार्क्स ने कहा कि यह स्वयं के खिलाफ संघर्ष है। इससे मिलती-जुलती बात देरिदा ने अपने अंतिम साक्षात्कार में कही कि ‘मैं स्वयं के खिलाफ युद्धरत हूं।’ तकरीबन यही नजरिया आलोचक नामवर सिंह का रहा है। वह निरंतर अपने कहे से संघर्ष करते रहे हैं। पिछले दिनों उनको दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सुनने का मौका मिला। उस कार्यक्रम में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं, जिनसे उनके अंदर की छटपटाहट का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनकी पहली गंभीर आलोचना यह थी कि उनसे लोग तीखे आलोचनात्मक सवाल नहीं पूछते। आमतौर पर नामवरजी स्वयं के प्रति बेहद क्रिटिकल रहते हैं और श्रोता भक्ति-भाव में डूबे रहते हैं। इससे अंदाजा लगता है कि आलोचना के परिवेश का कितना क्षय हुआ है। नामवरजी की वक्तृता शैली में नॉस्टेल्जिया जब भी आता है, बागी होकर आता है। बागी भाव में वह जब भी बोलते हैं, तो भिन्न रंग में नजर आते हैं, क्योंकि तब कोई न कोई समस्या उनको अंदर से उद्वेलित करती है और इसके समाधान को वह बागी भाव-बोध में खोजने की कोशिश करते हैं। इसके चलते वह अपने ही नजरिये से मुठभेड़ करते नजर आते हैं।..वह समस्या विशेष से परेशान रहते हैं और यही परेशानी उनको बार-बार नॉस्टेल्जिक बनाती है, परंपरा की ओर ले जाती है। वह जीवंत तत्व खोजते हैं और इस क्रम में अपने को प्रासंगिक बनाते हैं। यह उनके मंचीय तौर पर जिंदा बने रहने का मंत्र है।
 नया जमाना में जगदीश्वर चतुर्वेदी

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  • Web Title:खुद से लड़ते नामवर