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भीड़ का जुल्म जारी है

इस बार शमा बीबी और शहजाद मसीह की बारी थी। एक ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले इस नौजवान ईसाई जोड़ को ईशनिंदा के आरोप में जुनूनी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और उनकी लाशें भी जला डालीं। रिम्शा मसीह नाम की एक छोटी ईसाई बच्ची पर भी एक स्थानीय मौलवी ने ईशनिंदा का इल्जाम लगाया था, जो बाद में अदालत ने गलत करार दिया। साजिश रचने वाला मौलवी आज भी आजाद घूम रहा है और रिम्शा अपने कुनबे के साथ कनाडा में कहीं सुकून की जिंदगी जी रही है, क्योंकि उसका अपना मुल्क उससे सिर्फ मौत का वायदा कर सकता था। गोजरा की जोसेफ कॉलोनी और शांति नगर में भी ईसाई लोग और उनके मकान इसी आरोप में आग के हवाले कर दिए गए थे। इन मामलों में अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया। बरी होने वालों में गुस्सैल भीड़ में शामिल लोग, उनकी सदारत करने वाले नेता और लापरवाह पुलिस अफसर, सभी शामिल हैं। जाहिर है, ये लोग एक नई भीड़ की अगुवाई करने के लिए उपलब्ध हैं, जो एक बेबस बिरादरी के खिलाफ उठ खड़ी होगी। पुलिस अफसर ऐसी वारदातों को बढमवा देते हैं। आज आप लाहौर, कसुर, फैसलाबाद, मुल्तान या पाकिस्तान के किसी भी हिस्से में देखें, तो मासूम लोगों के कत्ल में शामिल हत्यारे आपको खुलेआम घूमते दिख जाएंगे। ताजा मामले में ही जो ब्योरे हासिल हुए हैं, उनके मुताबिक मुख्य आरोपी ईंट-भट्ठे का मालिक है, जिसने शमा और शहजाद पर कुरान-ए-पाक की कॉपी के निरादर का न सिर्फ आरोप लगाया, बल्कि उन्हें पुलिस को सौंपने की बजाय कमरे में बंद कर दिया। मगर अब तक भट्ठा मालिक को गिरफ्तार नहीं किया गया है। वे मौलवी भी आजाद टहल रहे हैं, जिन्होंने अपनी भडम्काऊ तकरीरों के जरिये मस्जिदों में भीड़ जुटाई। पंजाब सूबे के वजीर-ए-आलम ने इस मामले की तफ्तीश के लिए एक तीन मेंबर वाली कमेटी बनाई है, लेकिन इससे मुनासिब हल की उम्मीद बेमानी है। गैर-कानूनी हत्याओं से बचाव के तौर पर ईशनिंदा कानून के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस तरह के कानून जब तक कायम रहेंगे, आईने के ऊपर धब्बा ही कहे जाएंगे।  
द नेशन, पाकिस्तान

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