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गढ़वा में चुनावी मुद्दों की कहां है कमी

गढ़वा झारखंड की सीमा का आखिरी छोर,  बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों की सीमा से सटा हुआ इलाका है। एकदम उपेक्षित और पिछड़ा सा। प्रकृति भी इसके साथ हर साल मजाक करती है। बारिश नहीं होने की वजह से पिछले कई सालों से पूरा सुखाड़ का दंश झेल रहा है। एक भी सिंचाई परियोजना परवान नहीं चढ़ी है। गढ़वा के प्रतिष्ठित साहित्यकार रमेश चंचल कहते हैं- गढ़वा में मुद्दों की कोई कमी है क्या? जिधर सिरा उठाकर देखिए, मुद्दे ही मुद्दे नजर आएंगे। शहर का पूछेंगे तो बाइपास सड़क का अभाव, पानी की समस्या, बिजली संकट और ग्रामीण इलाकों में सिंचाई, पलायन बड़ी समस्या है।  लेकिन सबसे बड़ी समस्या एनएच -75 को लेकर है। यह सड़क अधूरी है और अब तक दर्जनों लोगों की जान ले चुकी है। पड़वा मोड़ से लेकर यह सड़क तीन राज्यों की सीमा तक पहुंचाती है। लेकिन हालत आपने देखी होगी।

इस संवाददाता ने भी इस सड़क की दुर्दशा देखी। कहने को यह नेशनल हाइवे है. लेकिन यह किसी ग्रामीण सड़क से भी बदतर हालत में है। बुधवार को आज नामांकन का आखिरी तारीख को लेकर सभी राजनीतिक दलों की सैकड़ों गाड़ियां धूल उड़ाती गढ़वा से पड़वा मोड़ होते हुए डालटनगंज की ओर जा रही है। जगह-जगह गडढों की वजह से हिचकोले खाती गाड़ियां सरपट भागी जा रही थीं। क्षेत्र के लोग हर दिन इस समस्या से दो-चार हो रहे हैं। पड़वा मोड़ से गढ़वा से 30 किलोमीटर और गढ़वा से आखिरी छोर सेमर मोड़ लगभग 45 किलोमीटर की दूरी एनएच-75 आमलोगों को सुविधा कम कष्ट ज्यादा दे रही है। लोगों को अपने जनप्रतिनिधियों से उम्मीद है कि कम से कम इस सड़क को तो पूरी करवाएं।
इस बार सिंचाई, सड़क और पेयजल संकट मुद्दा होगा ही। सााहित्यकार चंचल कहते हैं, लोगों को रोजी-रोजगार नहीं है। पलायन हो रहा है। लेकिन एक चीज आप खूब देखेंगे। यहां लोग शिक्षा की माफियागीरी खूब करते हैं। बेरोजगारों को प्रशिक्षित और शिक्षित कराने के नाम पर खूब पैसे ऐंठे जा रहे हैं।
नामांकन की आखिरी तारीख की वजह से गढ़वा का पूरा शहर गाड़ियों के रेलम-पेल से तबाह दिख रहा था। बाइक्स में नौजवान पार्टियों का झंड़ा लगाए सरपट भाग रहे थे। ऑटो और कारों के रेला समर्थकों को ढोने में व्यस्त था। लेकिन वे कहां जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं, अधिकतर लोगों को नहीं पता था।  लोकतंत्र के इस महापर्व में शामिल होने के लिए सभी बेताब दिखे।

 

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