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आतंकियों के निशाने पर अब पूर्वी सीमा

बर्दवान में हुए आकस्मिक विस्फोट के पीछे का सच यह है कि वहां से बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार को लक्षित किए जाने की तैयारी चल रही थी। यह भारत के लिए चेतावनी है कि वह पूर्व में भी सुरक्षा व्यवस्था चौकस करे। रविक भट्टाचार्य की रिपोर्ट

दो अक्तूबर को जब पूरा पश्चिम बंगाल दुर्गापूजा के उत्सव में डूबा था, तब बर्दवान शहर में खगरागोर के एक घर में विस्फोट से दो लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद कई गिरफ्तारियां हुईं। जांच में खुलासा हुआ कि पड़ोसियों को जो आवाज एलपीजी सिलिंडर फटने की लग रही थी, वास्तव में वह उन बमों का विस्फोट था, जिनका इस्तेमाल आतंकवादी बांग्लादेश में आतंकवाद फैलाने के लिए करने वाले थे। अधिकारियों का मानना है कि उनका इरादा शेख हसीना सरकार के सदस्यों को लक्षित करने का था।

पूर्व भारतीय सेनाध्यक्ष अवकाशप्राप्त जनरल शंकर रॉय चौधरी कहते हैं, ‘मैं यह नहीं कह रहा कि हम पूर्वी सीमाओं की उपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि इस क्षेत्र में हमारी इंटेलिजेंस उतनी कारगर नहीं है। मैं उम्मीद करता हूं कि डोवाल (27 अक्तूबर को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल पश्चिम बंगाल के दौरे पर आए थे) के दौरे के बाद केंद्र और राज्य इस मुद्दे पर एक साथ मिल कर काम करेंगे।’

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकी संगठन पश्चिम बंगाल में एक दशक से ज्यादा समय से पैर पसारने में लगे हैं। कथित तौर पर राज्य सरकार से गैर मान्यता प्राप्त मदरसों का इस्तेमाल इस तरह की गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। बर्दवान विस्फोट के मद्देनजर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार से मदरसों के बारे में रिपोर्ट मांगी है। 2001 में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने यह आरोप लगाया था कि राज्य के मदरसे आतंकियों की शरणस्थली बने हुए हैं। जहां विस्फोट हुआ है, वहां से इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (आईईडी) और जिहादी साहित्य मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र के हस्तक्षेप का विरोध किया। उन्होंने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) को गृह मंत्रालय के जोर देने पर ही जांच की अनुमति दी। एनआईए अधिकारियों के मुताबिक, बर्दवान और बीरभूम जैसे जिले, जिनकी सीमाएं बांग्लादेश से जुड़ी नहीं हैं, आतंकवादियों के लिए सुरक्षित होते जा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इन्हें गुप्त रूप से राजनीतिक समर्थन मिलता है। पहले सीमा से जुड़े जिलों जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया और उत्तरी 24 परगना में ही ज्यादातर आतंकी रहते थे, ताकि जब उन्हें पकड़े जाने का डर हो तो वह तुरत सीमा पार
कर जाएं।
 
इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक सदस्य यासिन भटकल को 2009 में कोलकाता से ही गिरफ्तार किया गया था। उसे तब रिहा करना पड़ा, जब पश्चिम बंगाल पुलिस उसकी पहचान नहीं कर पाई। 2013 में दोबारा उसे भारत-नेपाल सीमा पर गिरफ्तार किया गया। इंडियन मुजाहिदीन का एक और वरिष्ठ नेता आमिर रजा खान कोलकाता से ही है। बम बनाने में विशेषज्ञ और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य अब्दुल करीम टुंडा का भी बंगाल कनेक्शन है।

अधिकारियों ने अतीत में पश्चिम बंगाल से दूसरे राज्यों में जा रहे गोला-बारूद और विस्फोटकों को पकड़ा है, इसके बावजूद लश्कर-ए-तैयबा और हरकत उल जिहाद अल इस्लामी पश्चिम बंगाल का उपयोग एक सुरक्षित गलियारे के रूप में कर रहे हैं।

जब डोवाल मिले ममता से
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल पिछले महीने के अंतिम सोमवार यानी 27 अक्तूबर को राज्य सचिवालय नबन्ना में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिले। बैठक से पहले वह बर्दवान जिले के खगरागोर गए, जहां विस्फोट हुआ था। डोवाल एनएसजी के डायरेक्टर जनरल (डीजी) जयंत नारायण चौधरी, एनआईए के डीजी शरद कुमार और केंद्रीय गृह मंत्रालय के विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) प्रकाश मिश्रा के साथ गए। मुख्य सचिव संजय मित्रा, गृह सचिव बासुदेब बंदोपाध्याय, डीजीपी जी.एम.पी. रेड्डी, कोलकाता पुलिस कमिश्नर सुरजीत कर पुरकायस्थ, एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) शिबाजी घोष और आईजी (लॉ एंड ऑर्डर) अनुज शर्मा भी वहां मौजूद थे, जो मुख्यमंत्री के साथ आए थे। सूचना के अनुसार मीटिंग में डोवाल ने आतंकवाद की समस्या और बांग्लादेश के साथ भारत के अंतरराष्ट्रीय महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के इस आग्रह के बारे में भी बताया गया कि वे चाहते हैं कि जांच में राज्य केंद्र को सहयोग करे। सूत्रों ने बताया कि अधिकारियों ने बैठक को इस बात पर केंद्रित किया कि बर्दवान, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, मालदा, नादिया, उत्तरी और दक्षिणी 24 परगना के अलावा जलपाईगुड़ी पर भी नजर रखनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने यह आश्वासन दिया कि जांच में वह हर संभव मदद करेंगी। केंद्रीय अधिकारियों ने इस पर भी बात की कि राज्य के कम संसाधित और कम प्रशिक्षित सुरक्षा बलों के जरिये सीमा पार आतंकवाद को कैसे रोका जा सकता है। साथ ही राज्य व केंद्रीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और जानकारी साझा करने पर भी बात हुई।

सरहद का सच
बर्दवान घटना के बाद एनआईए ने लालगोला, मुर्शिदाबाद, करीमपुर और नादिया इलाके के मदरसों और घरों पर छापे मारे। इन जिलों की सीमाएं बांग्लादेश से जुड़ती हैं। इनकी पहचान आतंकवादियों के देश में प्रवेश करने और भागने वाले क्षेत्रों के रूप में भी की गई है। लालगोला में हीरोइन बनती है और यह तस्करी का भी केंद्र है। वर्तमान में यह राज्य तथा केंद्र दोनों सुरक्षा एजेंसियों की नजर में है। दो अक्तूबर की घटना के बाद बीएसएफ ने यहां चौकसी बढ़ा दी है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि इसके बावजूद सीमा पार से यहां घुसपैठ जारी है। राज्य के बर्दवान, बीरभूम, दक्षिण और उत्तरी 24 परगना में अब भी निजी मदरसे चल रहे हैं। इन मदरसों की जांच के लिए राज्य सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की गई है।

बर्दवान के पीछे
दो अक्तूबर को बर्दवान शहर के खगरागोर में किराये पर ली गई एक दो मंजिली इमारत में जोरदार विस्फोट की आवाज सुनी गई। एलपीजी सिलिंडर के फटने की आशंका के मद्देनजर अग्निशमन दस्ता और आपात सेवाकर्मी तुरत वहां पहुंचे, लेकिन फ्लैट के भीतर से एक औरत ने चेतावनी दी कि जो भी अंदर आने का प्रयास करेगा, उसे गोली मार दी जाएगी। तब बर्दवान पुलिस बल के अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और दरवाजा तोड़ कर अंदर घुस गए। भीतर तीन पुरुष खून से सने थे और दो औरतें लगभग एक-एक साल के दो बच्चों के साथ कागजात, सिमकार्ड नष्ट करने और फर्श पर से खून साफ करने में जुटी थीं। तीन घायलों में से एक की मौत घटनास्थल पर ही हो गई। मृतक का नाम शकील अहमद था। बचे दो में से एक की मौत अस्पताल पहुंचते ही हो गई, जिसकी पहचान शोभन मंडल के रूप में की गई। तीसरे अब्दुल हकीम को कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके जख्मी पैर का इलाज चल रहा है। उसे अब एनआईए के हवाले कर दिया गया है। पुलिस को वहां से आईईडी, जिहादी साहित्य और भारी मात्रा में सिम कार्ड और चिप बरामद हुए हैं। वे सब बांग्लादेश के प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (जेएमबी) के सदस्य थे। 11 अक्तूबर से एनआईए ने मामले की जांच शुरू कर दी।

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