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दिल्ली की बिसात पर नए मुद्दे

ग्यारह महीने बाद दिल्ली फिर चुनाव के दरवाजे पर खड़ी है। लोगों ने पांच साल के लिए वोट डाले थे। किसी दल का बहुमत आया नहीं और सरकार बनी भी, तो 49 दिनों के लिए। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद एक बार फिर सुगबुगाहट हुई कि जनता के ऊपर चुनाव का खर्च न पड़े, और शायद कोई नया जोड़तोड़ संभव हो। वह कसरत-कवायद भी कारगर नहीं रही। राष्ट्रपति द्वारा अब विधानसभा भंग किए जाने के बाद नया चुनाव होना तय है। अब सभी दल इस तर्क के साथ चुनाव मैदान में होंगे कि हम तो पहले दिन से चुनाव चाहते थे। भीतरखाने से जोड़-तोड़ करने का आरोप एक-दूसरे पर मढ़ा जाएगा। लोकतंत्र के लिए शुभ यह है कि इधर-उधर, खरीद-फरोख्त के अतीत के उदाहरणों को दिल्ली ने नहीं दोहराया। इस बार लड़ाई में यह मुद्दा भी होगा कि सिर्फ वोट या सीट नहीं, पूर्ण बहुमत चाहिए।

गुजरे एक साल में दिल्ली और देश का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। नए चुनाव के लिए दलों को अब नए नारे गढ़ने पड़ेंगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी (आप) ने ‘शीला हटाओ, केजरीवाल लाओ’ नारे के साथ कॉमनवेल्थ घोटाला और तब की यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों को अपना अस्त्र बनाया था। भाजपा के मुद्दे भी यही थे। अंतर सिर्फ इतना था कि चुनौतियों की उसकी गिनती में आम आदमी पार्टी कहीं थी ही नहीं। राजनीतिक टीकाकार भी आप को चार-पांच सीटों तक समेट रहे थे। इस बार ऐसा नहीं होगा। इस बात से कोई इनकार नहीं कर रहा है कि दिल्ली में लड़ाई आप बनाम भाजपा ही है।
कांग्रेस की रणनीति होगी कि आम आदमी पार्टी को अपरिपक्व और अराजकतावादी बताने पर जोर दिया जाए। शीला दीक्षित के जिस कार्यकाल की नाराजगी से कांग्रेस की यह दुर्गति हुई, उसमें हुए बेहतर कामों को गिनाए। लेकिन कांग्रेस मुख्य लड़ाई में आएगी, इस समय पार्टी के हालात को देखते हुए कोई भी मानने को तैयार नहीं है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास कुलजमा आठ सीटें आई थीं। दो मंत्रियों हारून यूसुफ और प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली को छोड़ दें, तो सारे मंत्री हार गए और स्वयं मुख्यमंत्री अपनी सीट नहीं बचा पाईं। कांग्रेस ज्यादातर सीटों पर नंबर तीन पर चली गई थी। कांग्रेस इस बार ढेर सारे नए चेहरे लाकर चुनाव लड़ने की कोशिश में है।

भाजपा अभी तक के सारे राजनीतिक दांव अपने हिसाब से चलती आई है। पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में जीत के बाद दिल्ली में चुनाव कराने की बात कही जा रही थी। अब झारखंड और जम्मू-कश्मीर के बाद चुनाव होना है। झारखंड में सरकार बनाना और जम्मू में दूसरे नंबर की पार्टी बनने की हैसियत पाना भाजपा के अगले लक्ष्य हैं। केंद्र में उसकी सरकार है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग पुरानी है, क्योंकि दिल्ली की बहुत-सी आंतरिक व्यवस्थाएं केंद्र पर निर्भर हैं। ऐसे में, भाजपा के पास तर्क होगा कि अगर एक दल की सरकार होगी, तो बेहतर समन्वय से काम होगा, वरना टकराहट में ज्यादातर वक्त निकल जाएगा। मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करने के अपने नए चलन को भाजपा दिल्ली में भी आजमाने जा रही है। इस प्रयोग पर उंगली यूं भी कम उठेंगी, क्योंकि हरियाणा और महाराष्ट्र की सफलता के बाद भाजपा को किसी को जवाब देने की जरूरत भी नहीं है। झारखंड में भाजपा ‘आओ चलें मोदी के साथ’ वाले नारे को दोहराते हुए चुनाव में उतर रही है। दिल्ली में लोकसभा की सभी सीटों का भाजपा के पास होना, पार्टी के लिए एक बड़ी ताकत है। हालांकि, पिछले चुनाव के उसके मुख्य चेहरे डॉ. हर्षवद्र्धन के केंद्र में स्वास्थ्य मंत्री बन जाने के कारण इस बार अरविंद केजरीवाल के मुकाबले एक दमदार चेहरा अनुपस्थित रहेगा।

भाजपा के सामने दिल्ली में चुनौतियां बाकी राज्यों से एकदम अलग होंगी। हरियाणा और महाराष्ट्र में सफलता के पीछे के कारणों में कई दलों की चुनाव में भागीदारी को भाजपा के पक्ष में जाना बताया गया। दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें लंबे समय से थीं। झारखंड में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस की मिली-जुली सरकार को कोसने के लिए बहुत कुछ है। दिल्ली में एक तो कोई सरकार नहीं है, ऊपर से एमसीडी में पिछले तीन टर्म से भाजपा का शासन है, वहां के भ्रष्टाचार को आम आदमी पार्टी लगातार भाजपा को घेरने के लिए उठाती रही है। आप पर 49 दिन में सरकार से भागने का जो आरोप भारतीय जनता पार्टी लगाती आई है, उसके लिए अरविंद केजरीवाल पहले ही माफी मांग चुके हैं।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी से आमने-सामने की लड़ाई में वोटों के बंटने का खतरा नहीं है। लोकसभा चुनावों से सबक लेते हुए आम आदमी पार्टी ने खुद को दिल्ली में समेट लिया है। जमीनी तैयारी में कोई भी आप को हल्का आंकने की भूल नहीं कर रहा है। पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिली थीं, पार्टी के चुनाव-चिन्ह झाड़ू से मिलते-जुलते सिंबल ‘टॉर्च’ के निर्दलीय उम्मीदवारों को चार जगहों पर 1,400 से 8,000 वोट मिल गए थे। बदली राजनीतिक भूमिका में आप के खेमे में गए वोटों के कुछ हिस्से अगर भाजपा की तरफ जा सकते हैं, तो सीधे भाजपा से टकराने की कुव्वत देखते हुए वोटों का एक बड़ा हिस्सा आप की ओर आ सकता है। लोकसभा चुनाव में सभी सीटों पर नंबर दो रही आम आदमी पार्टी अपने दावे को और पुख्ता करती है। इसलिए उसकी रणनीति में एक यह भी है कि लोकसभा में हारे उम्मीदवारों को विधानसभा में उतारा जाए।
पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के वोटों का ठीक-ठाक प्रतिशत आप की ओर चला गया था। आप की तरफ से लगातार बसपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में सक्रियता जारी है। आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली जीवन-मरण का प्रश्न है, पार्टी यहां अगर नहीं खड़ी हुई, तो उसका वजूद संकट में आ जाएगा। भाजपा के लिए बड़ा सवाल यही है कि अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आती है, तो रोज की टकराहट की किरकिरी से उसे जूझना होगा। इसलिए भाजपा एक-एक सीट की अपनी रणनीति पर काम कर रही है। दिल्ली के चुनाव के समय कहीं और चुनाव है नहीं, ऐसे में माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अतिरिक्त सक्रिय भूमिका में होंगे।
आम आदमी पार्टी जहां दिल्ली को दुनिया का सबसे बेहतर शहर बनाने का एजेंडा सामने रख रही है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के वक्त से कहते आ रहे हैं कि अगर हम देश की राजधानी को दुनिया में मॉडल नहीं बना सकते, तो कुछ नहीं कर सकते हैं। दिल्ली के लोग भाजपा या आप, जिसको भी चुनेंगे, उससे सिर्फ सरकार बनना तय नहीं होगा। यदि आम आदमी पार्टी सरकार में आती है, तो वैकल्पिक राजनीति गहराई और विस्तार, दोनों में अपनी जगह बनाएगी। भाजपा का अजेय अभियान अगर दिल्ली में फतह पाता है, तो मोदी मॉडल की सफलता पर मुहर लगेगी।

 

 

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