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पानी को मुफ्त का माल समझने का खामियाजा

अमेरिका के लॉस एंजिलिस में एक रेस्तरां के बाहर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लिखा गया है- ‘दक्षिण कैलिफोर्निया में आने वाले प्यासे यात्रियो, आपका स्वागत है। यहां आपको पांच वर्ष पुराना टॉयलेट वाटर मिलेगा।’ टॉयलेट यानी शौचालय का पानी, और वह भी पीने के लिए! पर यह सच है। इसे वहां लगी ईस्ट वैली वाटर रिक्लेमेशन परियोजना ने संभव बनाया है। इस परियोजना में सीवर के पानी को पीने लायक बनाया जाता है। इस शोधन प्रक्रिया में पांच वर्ष का समय लगता है। इसके पहले तक इस इलाके के लोगों को कनाडा से पानी आयात करना पड़ता था। कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में दुनिया के सभी देशों को ऐसे ही तरीकों पर निर्भर होना पड़े।

अनुमान है कि दुनिया भर का 97 प्रतिशत से अधिक पानी महासागरों और समुद्रों में है। 2.़5 प्रतिशत बर्फ के रूप में है और केवल 0.5 प्रतिशत हमें उपयोग के लिए मिलता है। इस 0.5 प्रतिशत का वितरण भी पूरी दुनिया के देशों में एक समान नहीं है। इसका अधिकांश अमेरिका और कनाडा की सीमावर्ती झीलों में गिरता है। इस समय दुनिया भर में प्राप्त पानी का सबसे अधिक हिस्सा कनाडा में है। पानी के इस विषम वितरण के कारण ही पानी की समस्या है। इसी कारण समय-समय पर कुछ देशों के बीच तनाव भी दिखता है। अपने देश में ही भावनगर और राजकोट में पानी के लिए दंगे होने की खबरें हम सुन चुके हैं। बढ़ती जनसंख्या, उद्योगीकरण के साथ ही नगरीकरण ने भी इस समस्या को और विषम बनाया है। देश की ज्यादातर नदियों के प्रदूषित होने की बात अब पुरानी हो चुकी है। अपनी ज्यादातर जरूरतों के लिए हम जमीन के नीचे से प्राप्त होने वाले जल पर निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे भू-जल का स्तर लगातार नीचे जाता जा रहा है। कृषि में रसायनों के बढ़ते इस्तेमाल से इस पानी के प्रदूषित होने की खबरें भी हैं।

आजकल दुनिया भर में पानी को बचाने के लिए तीन आर- रिड्यूस, रिसाइकिल और रियूज का फॉर्मूला दिया जाता है, यानी एक तो हम पानी का कम इस्तेमाल करें, उसे रिसाइकिल करें और इस पानी का दोबारा इस्तेमाल करें। वर्षा जल हमें अब भी भारी मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन हम इसका संग्रहण और संरक्षण नहीं कर पा रहे। इसके संरक्षण के परंपरागत तरीकों को हम छोड़ते जा रहे हैं और नए तरीके विकसित नहीं कर रहे। पानी की समस्या के मूल में लोगों की यह धारणा भी है कि यह ‘मुफ्त का माल’ है। पानी को मुफ्त का माल समझने की कीमत ही इस समय दुनिया को चुकानी पड़ रही है। अधिकांश लोग यही सोचते हैं कि पानी बहुतायत से मिलता है और यह सभी का प्राकृतिक अधिकार है। विडंबना यह भी है कि पानी पर कीमत लगा दी जाए, तो अमीरों की अपेक्षा गरीबों का यह अधिक चुकानी पड़ती है। लेकिन ऐसी सोच तो विकसित करनी ही होगी कि लोग पानी को बेशकीमती समझें, वे पानी का मूल्य चुकाएं या नहीं, यह अलग मसला है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 

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