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अयोध्या तब और अब

अयोध्या का अर्थशास्त्र बदल गया है। अस्सी के दशक तक यहां हनुमानगढ़ी और कनक भवन की ही महत्ता थी। तीर्थयात्री भी पास-पड़ोस के ही जिलों के होते थे। गाइड का काम भी पंडे करते थे। राम जन्मभूमि की हुई भी, तो सिर्फ चर्चा। मसलन- ‘पीछे उधर कहीं कोई मस्जिद है, जहां भीतर रामलला की मूर्ति है।’ मस्जिद में ताला था, दर्शन होने नहीं थे, तो आम श्रद्धालुओं की रुचि भी उसमें नहीं थी। अब अयोध्या-यात्रा की योजना में जन्मभूमि अनिवार्य रूप से शामिल है। बल्कि जन्मभूमि के नाम पर कुछ और पड़ाव पैदा हो गए हैं। एक अहम पड़ाव है विश्व हिंदू परिषद की राम जन्मभूमि कार्यशाला। इस कार्यशाला में 90 के दशक से ही मंदिर के लिए पत्थरों की नक्काशी का काम जारी है। यूं तो इस कार्यशाला के मुख्य द्वार पर एक छोटी-सी सूचना चस्पां है। पंडे, गाइड और ड्राइवरों का प्रवेश वर्जित है। पर यह सिर्फ एक वैधानिक चेतावनी है। कार्यशाला का माहौल बताता है कि उसे हर क्षण सैलानियों की प्रतीक्षा है। सैलानी कहें या श्रद्धालु, अब उनकी तादाद और तस्वीरें भी बदल गई हैं। खास तौर पर 1992 के बाद। अब महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल के अलावा सुदूर दक्षिण से भी तीर्थयात्री आते हैं। टूर ऑपरेटरों ने पारंपरिक दर्शन से इतर दर्शनीय स्थल तलाश लिए हैं। चाहे वह राम जन्मभूमि कार्यशाला हो या फिर कारसेवकपुरम। तीर्थयात्रियों के साथ आए गाइड पत्थर दिखाकर बताते हैं कि इन्हीं से प्रस्तावित राम मंदिर बनना है। पत्थरों पर जमी काई अपनी कहानी खुद-ब-खुद बयां करती है।
आईबीएन खबर में राज शेखर

 

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