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ओबामा की हार

यह लगभग तय था। अमेरिकी सीनेट के उपचुनावों में राष्ट्रपति बराक ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी की करारी हार हुई है और सीनेट में पार्टी का बहुमत भी खत्म हो गया है। रिपब्लिकन पार्टी की जीत ने पार्टी के समर्थकों के हौसले बढ़ा दिए हैं। ये बढ़े हुए हौसले 2016 में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में शायद मददगार न हों, बल्कि ये नुकसानदेह भी हो सकते हैं। रिपब्लिकन पार्टी ने राष्ट्रपति ओबामा के पूरे कार्यकाल में बहुत आक्रामक और अड़ियल रुख अपनाया है। अमेरिकी राजनीति का यह रिवाज रहा है कि व्यापक मतभेदों के बावजूद दोनों पार्टियां संसदीय कामकाज में सहयोग करती हैं। यह सहयोग पिछले कुछ साल में बहुत घट गया है और इससे राष्ट्रपति ओबामा कई महत्वपूर्ण फैसले नहीं कर पाए। रिपब्लिकन पार्टी ने इसे ऐसे प्रचारित किया कि ओबामा कुशल और चुस्त प्रशासक नहीं हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी अपने चुनाव अभियान में इस प्रचार को नहीं काट पाई। लेकिन अब उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी से काम करना होगा, क्योंकि और दो साल अगर सरकार और विधायिका में टकराव जारी रहा, तो रिपब्लिकन को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब सीनेट और प्रतिनिधि सभा, दोनों जगह उनका बहुमत है, अगर वे सिर्फ हर पहल को रोकने वाले बने रहे, तो वोटर उनके पक्ष में नहीं होंगे। यह भी देखा जाएगा कि इन दो वर्षों में विधायिका ने आम जनता के लिए क्या-क्या किया।

यह सही है कि राष्ट्रपति ओबामा की लोकप्रियता इस वक्त बहुत कम है। दो साल पहले प्रभावशाली तरीके से दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ओबामा अचानक सुस्त और अनिश्चय वाले राष्ट्रपति लगने लगे हैं। चाहे स्वास्थ्य क्षेत्र के सुधार हों या व्हाइट हाउस की सुरक्षा में सेंध का मामला, ओबामा की छवि ध्वस्त हुई है और बतौर प्रशासक उनका ग्राफ गिरा है। विदेश नीति के मामले में भी वह दृढ़ निश्चयी और सख्त नेता की तरह नहीं दिख रहे हैं। खासकर सीरिया के मामले में उनकी हिचकिचाहट ने उनकी लोकप्रियता घटाई है। ओबामा की अलोकप्रियता इन चुनावों में उनकी पार्टी की हार के लिए बड़ी हद तक जिम्मेदार है, लेकिन उनकी पार्टी का प्रदर्शन भी चुनावों से पहले और चुनावों के दौरान बहुत कमजोर रहा। पार्टी अपनी सरकार की उपलब्धियां जनता को नहीं बता पाई। वह एकजुट और अनुशासित भी नहीं दिख पाई। उनकी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अमेरिका तमाम विकसित देशों के मुकाबले तेजी से आर्थिक मंदी से उबरा है, वहां विकास दर तेज हुई है और रोजगार भी बढ़ रहे हैं। लेकिन इस उपलब्धि का सही प्रचार डेमोक्रेटिक पार्टी के लोग नहीं कर पाए, जबकि रिपब्लिकन ने ज्यादा सुनियोजित तरीके से चुनाव लड़ा।

दो साल बाद सीनेट के एक-तिहाई सदस्यों का फिर से चुनाव होगा और तभी राष्ट्रपति चुनाव भी होगा। जानकार यह मानते हैं कि इन चुनावों का तब तक कोई असर नहीं रहेगा। अगर तब तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था इसी तरह तरक्की करती रही, तो इसका फायदा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को मिलेगा। युवा, अश्वेत और अपेक्षाकृत कमजोर आर्थिक स्थिति वाले नागरिकों में अब भी डेमोक्रेटिक पार्टी का जोर है और राष्ट्रपति चुनाव में ये लोग बड़ी तादाद में वोट डालने आएंगे। स्वयं ओबामा चुनाव नहीं लडेंगे, इसलिए उनकी व्यक्तिगत छवि का भी ज्यादा असर नहीं होगा। अगर रिपब्लिकन पार्टी के नेता अपने संसदीय बहुमत का रचनात्मक इस्तेमाल करेंगे और अगले चुनावों में अपनी उपलब्धियां गिनवा पाएं, तो राष्ट्रपति चुनावों में भी सफलता की उम्मीद कर सकते हैं और अगर वे इस जीत के नशे में आ गए, तो उसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ सकता है।

 

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