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आतंक बनाम सोशल मीडिया

वे दिन बहुत दूर नहीं गए, जब गवर्नमेंट कम्युनिकेशन्स हेडक्वाटर्स (जीसीएचक्यू) को गोपनीय सरकारी तंत्र के तौर पर देखा जाता था। अब भी इसके निदेशक बोलते हुए विरले दिखते हैं। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ सोशल मीडिया कंपनियों की मदद के आह्वान से जुड़े रॉबर्ट हैन्निगन के वक्तव्यों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। वह हाल ही में जीसीएचक्यू के तहत एक केंद्र के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं। हैन्निगन ने कहा कि इंटरनेट के बड़े खिलाड़ी, जैसे ट्विटर, फेसबुक व व्हाट्स ऐप आतंकियों और अपराधियों के लिए ‘कमांड-ऐंड-कंट्रोल नेटवर्क’ बन गए हैं। उन्होंने सलाह दी कि इन संगठनों के प्रबंधकर्ता इस तथ्य को खारिज करते हैं कि इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नापाक उद्देश्यों के लिए होता आया है। हैन्निगन ने इस ओर संकेत दिया कि इंटरनेट के दम पर आतंकी संगठन आईएसआईएस ने अपना विस्तार किया। इस तरह, वह किसी पुराने आतंकी संगठन से अलग हो जाता है और इसलिए यह चुनौती खड़ी होती है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर परोसे जा रहे आतंकवाद से निपटना मुश्किल हो रहा है। आतंकी हमलों की साजिशों से इस मुद्दे का कम जुड़ाव है, बल्कि ज्यादा जोर इसके इस्तेमाल की तरफ है कि जिहादियों के विचार इस पर चस्पां होते हैं, आतंकियों द्वारा बंधकों के सिर कलम किए जाने के वीडियो होते हैं। आईएसआईएस इस मामले में भी दूसरे आतंकी संगठनों से भिन्न है कि उसका संचार-तंत्र अभेद्य लगता है। लेकिन इस तरह की गतिविधियों को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है? निस्संदेह, सोशल मीडिया के विभिन्न रूपों को बंद करने या उन पर सेंसरशिप थोपने का सवाल नहीं उठता। हैन्निगन चाहते हैं कि इस साझे दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में वेब कंपनियां अधिक सहयोग करें। बिना इस सहयोग के आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे संगठन अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगे। अभिव्यक्ति की आजादी से किसी प्रकार के समझौते के प्रति उनकी अनिच्छा समझ में आती है, क्योंकि यह उद्योग इसी पर टिका हुआ है। लेकिन उनको उन लोगों को पहचानने में मदद करनी चाहिए, जो हमें नुकसान पहुंचाते हैं।
द टेलीग्राफ, लंदन

 

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