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फिल्म रिव्यू : सुपर नानी

फिल्म रिव्यू : सुपर नानी

नब्बे के शुरुआती दशक में मेलोड्रामा किंग कहे जाने वाले निर्देशक इंद्र कुमार ने कभी फिल्म ‘दिल’ के जरिये अभिनेता आमिर खान को एक बडम ब्रेक देकर फिल्मों में जीवनदान दिया था। ‘बेटा’ से उन्होंने माधुरी दीक्षित को धक-धक गर्ल बनाया और फिर नई सदी के बाद वह द्विअर्थी संवादों वाली फिल्में बनाने लगे, जिन्हें उन्होंने ‘पारिवारिक फिल्मों’ का नाम दिया। पिछले साल आई उनकी फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ भी एक ऐसी ही पारिवारिक फिल्म थी, जिसे परिवार के लोग साथ-साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग बैठ कर ही देख सकते थे।

अब लंबे समय बाद इंद्र कुमार ने अभिनेत्री रेखा के कमबैक के लिए ‘सुपर नानी’ बनाई है, जिसे उन्होंने अपने नब्बे के दशक के स्टाइल में बनाया है। इस फिल्म में ढेर सारा ड्रामा भी है, ट्रेजिडी भी है, इमोशन भी है.. और भी बहुत कुछ है। पर इससे पहले फिल्म की कहानी...

भारती भाटिया (रेखा) अपने पति आर. के. भाटिया (रणधीर कपूर), बेटे सुकेतू (राजेश कुमार), बहू आस्था (श्रेया नारायण) और एक जवान बेटी गार्गी (आंचल द्विवेदी) के साथ मुंबई में रहती है। भारती अपने परिवार को एकजुट देखना चाहती है और उसकी सलामती के लिए ये गीत गाती है, प्रभु मेरे घर को प्यार करो, मेरे घर का उद्धार करो...पर घर के सदस्यों की नजरों में भारती एक नौकरानी बन कर रह गई है। कोई उसकी कद्र नहीं करता। ऐसे में एक दिन अमेरिका से उसका नवासा मन (शरमन जोशी) वापस आता है और अपनी नानी की ये हालत देख कर उनका मेकओवर करने की ठान लेता है। मन के इस काम में उसकी मदद करती है रिया (श्वेता कुमार), जो उससे मन ही मन प्यार करती है। एक दिन मन घर वालों की मर्जी के खिलाफ भारती को मॉडलिंग करने के लिए राजी कर लेता है, जिसके बाद भारती की जिंदगी बिल्कुल बदल जाती है। उसे नाम और शोहरत तो मिल जाती है, लेकिन घर में इज्जत नहीं। इसलिए मन एक और प्लान बनाता है, जिसके बाद घर वालों की अक्ल ठिकाने आ जाती है।

करीब 100-150 शब्दों में किसी फिल्म की स्टोरी बता देने को फिल्म इंडस्ट्री में वन लाइनर कहा जाता है, जिसे अक्सर निर्माता या निर्देशक हीरो-हीरोइन को सुनाते हैं। उपरोक्त बयां की गई पंक्तियां ‘सुपर नानी’ का वन लाइनर ही है, जिसे फिल्म का प्रोमो देख कर भी समझा जा सकता है।

बेशक ‘सुपर नानी’ एक पारिवारिक फिल्म है और इसमें रेखा की अच्छी एक्टिंग भी है, पर ऐसी कहानियों से तो अब धारावाहिकों की टीआरपी बढ़नी भी बंद हो गई है। आज टूटते परिवारों को बचाने के साथ-साथ एकल परिवार की मुश्किलों के हल ढूंढ़ने और बच्चों के ऊंची उड़ान के सपनों के साथ उड़ने का दौर है। इंद्र कुमार की ये फिल्म केवल एक छोर की कहानी बयां करती है, जबकि दिक्कतें आज हर छोर पर हैं। फिल्म कुछेक जगह इमोशंस में बांधती है, पर बाकी जगहों पर कमजोर कहानी घुटने से टेकती नजर आती है। एक सीन में मन कहता है- ‘वाह नानू हमारे अमेरिका से अच्छी-अच्छी दवाइयां भारत आने में सालों लग जाते हैं, लेकिन वहां की बीमारियां सबसे पहले यहां आती हैं।’ लिव-इन-रिलेशनशिप पर सवाल उठाता ये संवाद सही जगह फिट किया गया है। काश, बाकी जगहों पर भी ऐसी ही फिटिंग हो पाती।

1987 में निर्देशक टी. रामाराव की फिल्म आई थी ‘संसार’, जिसमें रेखा ने एक ऐसी बहू का किरदार निभाया था, जो एक टूटते परिवार के पायों को जोड़ती है और फिर बदलते जमाने के साथ एकल परिवार पर जोर देती है। इस फिल्म में अनुपम खेर ने रेखा के ससुर का किरदार अदा किया है।

मुझे याद नहीं कि वो फिल्म हिट थी या फ्लॉप, लेकिन उसमें दिखाई गयी तमाम बातें आज भी याद हैं। इसलिए ‘सुपर नानी’ में परिवार को बचाने की खातिर मॉडलिंग का मेकओवर गले नहीं उतरता।


कलाकार : रेखा, शरमन जोशी, रणधीर कपूर, अनुपम खेर, श्वेता कुमार, राजेश कुमार, श्रेया नारायण, आंचल द्विवेदी
निर्देशक: इंद्र कुमार
निर्माता: इंद्र कुमार, अशोक ठकारिया
गीत: समीर, संजीव चतुर्वेदी
संगीत : हर्षित सक्सेना, संजीव दर्शन
संवाद-पटकथा-लेखक : विपुल मेहता

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