DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पलामू के सूखे खेत सियासतदाओं को चिढ़ा रहे मुंह

झारखंड में राजनीतिक दृष्टिकोण से पलामू की भूमि सर्वाधिक उर्वरा है। लेकिन यहां के खेत उर्वर होते हुए भी बंजर पड़े रह जाते हैं। इस साल भी मानसून ने पलामू की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी है। पलामू के सूखे खेत सियासतदाओं का मुंह चिढ़ा रहे हैं। विधानसभा चुनाव में पलामू के सूखे इलाकों में पाटन, विश्रामपुर, लेस्लीगंज, पांकी और चैनपुर के लोगों को मानसून के साथ-साथ राजनीतिज्ञों ने भी साथ नहीं दिया। धान के खेत सूखे पड़े हैं। सुखाड़ घोषित होने के बावजूद किसानों को कुछ हाथ नहीं आया। सरकार कुछ करती या नहीं करती, चुनाव की घोषणा के बाद सब कुुछ बे्रक लग गया। पलामू के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र सिंह रुबी का कहना है कि इस बार सुखाड़ चुनावी मुददा होगा ही। पलामू के लिए बेरोजगारी दूसरी बड़ी समस्या और चुनावी मुद्दा है। पलामू की बेरोजगारी खत्म होगी तो उग्रवाद भी खत्म हो जाएगा।

रांची से डालटनगंज की मुख्य सड़क से दोनों किनारे कुछ इलाकों को छोड़ दें, तो दूर तक सूखे खेत नजर आते हैं। मेदिनीनगर शहर घुसने के पहले चियांकी के पास सूखे खेत अभी भी सुखाड़ की निशानी बने हुए हैं। हां, एनएच के दोनों ओर कुछ इलाके हरे-भरे जरूर दिखते हैं, लेकिन इस हरियाली में ऊपरवाले की कृपा कम, किसानों की हाड़तोड़ मेहनत और मलय डैम के पानी की विशेष कृपा से हरियाली दिखाई देती है। सतबरवा, पोलपोल और लहलहे के कुछ इलाके लगते ही नहीं कि ये सुखाड़ग्रस्त पलामू के हिस्से हैं।

पलामू में बेरोजगारी और सुखाड़ से निजात मिल जाए तो पलामू अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा। क्षेत्र की ये सबसे बड़ी समस्या है।
सुरेंद्र सिंह रुबी, वरिष्ठ पत्रकार, पलामू।
पलामू लगातार तीसरे साल सूखे की मार झेल रहा है। सरकार सुखाड़ घोषित तो करती है, लेकिन यह सिर्फ कागज पर ही रह जाता है। किसानों को कोई मदद नहीं मिलती है। चुनाव में यह तो मुद्दा बनेगा ही।
धु्रव सिंह, किसान, ठकुराई डबरा, लेस्लीगंज, पलामू।

चुनावी मैदान में कई नए चेहरे
पलामू की चुनावी राजनीति इस बार कुछ अलग दृश्य दिखानेवाले हैं। सूबे की सत्ता में जोरदार ढंग से दखल रखनेवाले पलामू के सियासतदां सरकार बनाने और गिराने में अब तक अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इस बार भी कई दिग्गज फिर चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। बुधवार को परचा दाखिला का आखिरी दिन है। इसके बाद चुनावी रणभूमि की पूरी तसवीर साफ हो जाएगी। इस कई शख्सियत बदले चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में होंगे। राधाकृष्ण किशोर, रामचंद्र चंद्रवंशी, (दोनों भाजपा) विदेश सिंह (कांग्रेस) बदले चुनाव चिन्ह के साथ वोटरों के पास जाएंगे, वहीं मनोज सिंह (भाजपा), आलोक चौरसिया (झाविमो), लालसूरज सिंह (झामुमो), अजय दुबे (कांग्रेस), अमित तिवारी (भाजपा), संजय सिंह (झामुमो) और रवींद्र सिंह (झाविमो) चुनावी राजनीति के एकदम नए चेहरे हैं।

 

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पलामू के सूखे खेत सियासतदाओं को चिढ़ा रहे मुंह