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वाघा पर विस्फोट के अर्थ

यह सेरेमनी 1959 से चली आ रही है। वाघा सीमा पर बीटिंग रिट्रीट समारोह भारत की तरफ से सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान की तरफ से पाकिस्तानी रैंजर्स संयुक्त रूप से परफॉर्म करते हैं। दोनों तरफ से हर शाम यह प्रदर्शन किया जाता है कि हमारे सैनिक और अर्ध सैनिक बल कितने चुस्त-दुरुस्त और मुस्तैद हैं। समय के साथ सीमा पर यह शक्ति-प्रदर्शन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया और अब तो हर शाम इस समारोह को देखने के लिए दोनों तरफ से हजारों लोग और विदेशी सैलानी इकट्ठा होते हैं। वाघा सीमा पर जो लोहे का दरवाजा है, वह इसी बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए पहले खुलता था। लेकिन लोगों की आवाजाही और व्यापार के लिए भी यह दिन में खुलने लगा है।

इसलिए यह पूरा आयोजन ‘दिखावे’ का रह गया है। अब इस दिखावे को जारी रखा जाना चाहिए या नहीं, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है और इस पर किसी भी तरह का निर्णय दोनों तरफ की सरकारों के अधिकार-क्षेत्र में है। बहरहाल, इन दिनों यह समारोह इसलिए सुर्खियों में है कि गए रविवार को वाघा बॉर्डर के नजदीक पाकिस्तान में फिदायीन हमला हुआ, जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए और कई बुरी तरह घायल हैं। पाकिस्तान की तरफ से एक आतंकी दो बैरियर पार करके तीसरे तक पहुंच गया था कि उसे पाकिस्तानी रैंजर्स ने धर दबोचा और उसी जगह पर उसने बड़ा विस्फोट कर दिया। पहली नजर में ऐसा प्रतीत होता है कि आतंकी पाकिस्तानी सेना को नुकसान पहुंचाने आए थे और उसमें काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन क्या सब कुछ ऐसा ही है? गौर करें, तो लगता है कि आतंकी की योजना यह थी कि वह वाघा बॉर्डर के लोहे के दरवाजे तक पहुंच जाए और फिर धमाका करे।

अगर यह होता, तो भारतीय सीमा सुरक्षा बल के जवान और हमारे सैलानी, दोनों इसका निशाना बनते। इस तरह, दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच जाता, जो पहले से ही बढ़ा हुआ है। हमारी तरफ से यह दावा होता कि पाकिस्तान की ओर से घुसे आतंकी ने विस्फोट किया। इसलिए हमारे नजरिये से यह हमला नाकाम रहा है। फिदायीन हमले का यह समय बताता है कि तालिबानी आतंकी बदले के फिराक में हैं। गौरतलब है कि पाकिस्तानी फौज अफगानिस्तान से सटे वजीरिस्तान इलाके में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब चला रही है। ऐसे में, आतंकियों के पास बदले की कार्रवाई के तौर पर तीन रास्ते थे। पहला, वे किसी जगह पर धमाका कर अधिक से अधिक जान-माल का नुकसान पहुंचाते। फिर यह हमला खबर तो बनता, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक सुर्खियां नहीं पाता, क्योंकि पाकिस्तान में आए दिन बम-विस्फोट होते रहते हैं।

दूसरा, वे सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते। यह सीधे-सीधे पूरी व्यवस्था पर हमला होता और बदले में आतंकियों को बड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ जाता। और तीसरा कि वह ऐसी जगह को चुनते, जहां अधिक से अधिक जान-माल का नुकसान हो, बड़ी खबर बने और वजीरिस्तान में जारी ऑपरेशन से पाकिस्तानी फौज का ध्यान हटे और एक साथ दो देशों में खौफ का माहौल बन जाए। इस तीसरे रास्ते के हिसाब से वाघा बॉर्डर सबसे सही स्थान था। यह विस्फोट फिर से बताता है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती उसके देश के अंदर ही है, पड़ोसी भारत नहीं। यही बात एक मिसाल के तौर पर देखी जाए, तो पाकिस्तान को यह समझने में ज्यादा देर नहीं लगेगा कि उसके पाले गए आतंकी उसे ही निचोड़ रहे हैं। यदि ऐसे समय में दोनों तरफ से बीटिंग रिट्रीट समारोह रोक दिए जाएं, तो इससे यही संदेश जाएगा कि सुरक्षा व्यवस्था कमजोर थी और सरकारें भयभीत हैं। बीटिंग रिट्रीट को तीन दिन रद्द करने के फैसले के कुछ घंटों बाद ही पाकिस्तान ने आम पर्यटकों के लिए इसे खोल दिया।

भारत की तरफ से भी यह आयोजन संपन्न हुआ। यह रवैया संकेत देता है कि समारोह और सुरक्षा बलों की जीत हुई है, आतंकियों की नहीं। यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी तरफ से आतंकी नहीं घुसा था, इसलिए हमारी सुरक्षा-व्यवस्था पर सवाल उठाना या संदेह करना गलत ही होगा। दूसरी तरफ, पाकिस्तान ने भी दरवाजे से
350-400 मीटर पहले ही आतंकी को धर-दबोचा, यानी उसके रैंजर्स भी कमोबेश चौंकन्ना थे। इसलिए अगर रोज की व्यवस्था के विपरीत कुछ कदम उठाया जाता है, यह आतंकियों के दुस्साहस को बढ़ाएगा ही। पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवाद को तीन संदर्भों में देखा जाना चाहिए। पहला, पिछले करीब छह दशक से पाकिस्तानी सेना इस लक्ष्य के आधार पर अपना विस्तार कर रही है कि उसका दुश्मन हिन्दुस्तान है। हाल के समय में पाकिस्तानी सेना के कई रिटायर्ड अधिकारियों की किताबें आईं, जिनमें यह लिखा गया है कि अगर वे हिन्दुस्तान के खिलाफ अपनी नीति बदल देंगे, तो पाकिस्तानी सेना का बजट कम हो जाएगा, जनाधार घटेगा और घरेलू सियासत में फौज महत्वहीन हो जाएगी। पाकिस्तान के नए सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ ने हालांकि यह माना कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन आतंकवाद है।

पुराने सेनाध्यक्ष कियानी भी इससे सहमत थे। लेकिन अब भी पाकिस्तानी सेना का एक धड़ा आतंकियों के प्रति नरमदिल है। दूसरा, पूरे पाकिस्तान को, जिसमें उसकी सरकार, सेना और जनता शामिल हैं, यह समझना होगा कि आतंक से मुकाबले की राह में कठिनाइयां आती ही हैं, क्योंकि जो गलती पाकिस्तान ने की है, उसका खामियाजा उसे भुगतना ही होगा। यह लड़ाई पाकिस्तानी व्यवस्था का कोई एक अंग नहीं जीत सकता, बल्कि इसके लिए सभी अंगों को साथ मिलकर काम करना होगा। और तीसरा, जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में कहा था कि बैड टेररिस्ट और गुड टेररिस्ट के बीच लकीर नहीं खींचनी चाहिए, इसे सही अर्थों में पाकिस्तान को समझना होगा। एक को राहत देना और दूसरों को पकड़ना समस्या का समाधान नहीं है। पहले भी पाकिस्तान ने अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान का जो फर्क किया था, उससे उसे नुकसान उठाना पड़ा।

पाकिस्तान के लिए यही एक सलाह है कि वह दुनिया के सारे उदाहरणों को सामने रखते हुए तमाम आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करे। इस मुल्क के खास दोस्त सऊदी अरब और चीन ने भी कई बार चेताया है कि आतंकवाद के मसले पर हमें शर्मसार न करो, बल्कि इससे निपटो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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