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बोझ से परे

ज्यादातर लोग बोझ से दबे हैं। किसी पर महत्वाकांक्षा बोझ बनकर हावी है, तो किसी पर आत्महीनता। बच्चे बस्तों के बोझ से दबे हैं, तो बड़े कमाने और घर-बार चलाने से। भारहीन अवस्था में कम ही लोग दिखते हैं, जबकि यह गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने के लिए अनिवार्य है। आप जितने अधिक बोझ के साथ होते हैं, आपको उतनी ही परेशानी होती है। किसी भी इंसान को देखिए, उसके पास अधूरे सपनों, अधूरी कामनाओं और अब तक के खोया-पाया का बेहिसाब बोझ होता है। ये सब उन्हें चैन से रहने नहीं देते। मनोवैज्ञानिक फ्रेड बुशमैन कहते हैं, ये बोझ स्वाभाविक नहीं। ये केवल इसलिए कंधे पर सवार हैं कि हममें प्रकृति, तंत्र और आसपास के परिवेश की कार्यप्रणाली की समझ की कमी है और सही तरीके से इस्तेमाल न कर पाने की अयोग्यता है। यह अयोग्यता कैसे आई, इस पर वह कहते हैं- यह तनाव के प्रति हमारे अतिथिगत व्यवहार से आई है। हम छोटी-छोटी चीजों से संतुष्ट नहीं होते और इस तरह तनाव के बोझ को खुद ही आमंत्रण देते हैं।

सुजैन जेफर्स, जिन्होंने एक शानदार किताब लिखी है फील द फियर ऐंड डू एट एनी वे  कहती हैं- तनाव का गट्ठर जिन वजहों से लोगों ने कंधों पर लादा है, वे उतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं, लेकिन प्रभावशाली इतनी होती हैं कि हमारे दिमाग पर उनका जबर्दस्त असर होता है। सही मायनों में हमने बोझहीन रहने की कीमत नहीं समझी है और इसीलिए अपने जीवन की भी कद्र नहीं की, जो हमें मिला सबसे शानदार गिफ्ट है। ओपरा विनफ्रे ने इसे समझा और लोगों को समझाने के लिए ‘लिव योर बेस्ट लाइफ’ कार्यक्रम की शुरुआत की। उन्होंने लोगों से सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने का संकल्प ही नहीं कराया, बल्कि अपने कार्यक्रम के जरिये उन्हें दिशा भी दी। उन्होंने बताया, सर्वश्रेष्ठ जीवन का मतलब है एक उद्देश्य खोज लेना, अच्छा महसूस करना और अपने भीतर शांत होना। पहाड़ों पर बसी झील की तरह। 

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