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गांधी की नजर में गोर्की

एक सीमा तक भारत और रूस के लोगों के बीच तुलना की जा सकती है। जैसे हम गरीब हैं, रूसी लोग भी गरीब हैं। सरकार के कामकाज में हमारी कोई नहीं सुनता और हमें बिना किसी हील-हुज्जत के टैक्स देने होते हैं, रूसी लोगों के साथ भी यही होता है। ऐसे शोषण को देखकर कुछ रूसी समय-समय पर इसके विरोध के लिए सामने आते रहे हैं। कुछ समय पहले ही रूस में एक विद्रोह हुआ था और उसमें भाग लेने वाले प्रमुख लोगों में थे लेखक गोर्की। उनका बचपन बेहद गरीबी में बीता था। उन्होंने पहले जूते बनाने वाले की दुकान पर काम किया, जिसने उन्हें काम से निकाल दिया। कुछ समय तक उन्होंने सैनिक के रूप में काम किया। सेना में नौकरी के दौरान ही उनके मन में शिक्षा के प्रति लालसा जगी, लेकिन गरीब होने के कारण वह किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश नहीं ले सकते थे। उसके बाद उन्होंने एक वकील के यहां और अंततोगत्वा एक ब्रेड बनाने वाली दुकान में काम किया।

इन सभी कामों के दौरान वह निजी प्रयासों से खुद को शिक्षित करते रहे। 1892 में लिखी उनकी पहली ही किताब इतनी अच्छी थी कि वह जल्द ही मशहूर हो गए। उसके बाद उन्होंने बहुत सारी चीजें लिखीं। उनके लेखन का एक ही मकसद है, लोगों को उस शोषण के खिलाफ जगाना, जिसमें वे जी रहे हैं, शासन को चेतावनी देना और समाज की सेवा करना। ऐसा माना जाता है कि इस वक्त यूरोप में जनता का पक्ष लेने वाला उनके जैसा दूसरा कोई लेखक नहीं है।
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