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अपराध या अधिकार

कैंसर की मरीज 29 साल की ब्रिटनी मेनार्ड ने आखिरकार गरिमापूर्ण स्वैच्छिक मौत पाने की अपनी इच्छा पूरी कर ली। ब्रिटनी का कैंसर ठीक नहीं हो सकता था और उसकी मांग थी कि घिसट-घिसटकर दर्दनाक मौत मरने की बजाय उसे शांतिपूर्ण मौत चुनने की आजादी मिले। दुनिया में ऐसे काफी लोग हैं, जो यह मानते हैं कि व्यक्ति को अपनी इच्छा से मरने का अधिकार मिलना चाहिए। ब्रिटनी मेनार्ड ऐसे अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले समूहों की आवाज बन गई थीं। लेकिन अमेरिका के जिस राज्य कैलिफोर्निया में वह रहती थीं, वहां इस तरह से इच्छा-मृत्यु का कानून नहीं था। अमेरिका में ओरेगॉन ऐसा राज्य है, जहां लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टरों की सहायता से अपना जीवन खत्म करने का अधिकार है। ब्रिटनी पोर्टलैंड, ओरेगॉन चली गईं और वहां डॉक्टरों की देखरेख में उन्हें जीवन खत्म करने वाली दवाएं दी गईं। ब्रिटनी चली गईं, लेकिन जिस मुद्दे की वह प्रतिनिधि बन गई थीं, उस पर बहस जारी रहेगी।

दुनिया के ज्यादातर देशों में स्वेच्छा मृत्यु का अधिकार नहीं है। कनाडा और अमेरिका के कुछ राज्यों और नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, लक्जमबर्ग जैसे कुछ ही देशों में लाइलाज मरीजों को अपना जीवन खत्म करने का अधिकार है। इसके समर्थक मानते हैं और ब्रिटनी ने भी अपने आखिरी संदेश में लिखा है कि इस तरह की मौत को आत्महत्या नहीं मानना चाहिए, क्योंकि लाइलाज गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मौत तो बीमारी से होनी ही है। वह सिर्फ यह चाहता है कि उसकी मौत शांतिपूर्ण और गरिमामय हो। लेकिन इसके विरोधी यह कहते हैं कि जीवन खत्म करना किसी भी वजह से हो, वह आत्महत्या है और आत्महत्या करना अपराध और पाप है। एक खतरा यह भी है कि ऐसे मरीज की सचमुच मरने की इच्छा है या उस पर दबाव डाला जा रहा है, यह बताना मुश्किल है। कुछ लोग तो यह तक मानते हैं कि जीवन खत्म करना व्यक्ति का अपना हक है और वह अधिकार उसे मिलना चाहिए। इसके खिलाफ दोनों किस्म के तर्क हैं।

कानूनी तर्क यह है कि ऐसे अधिकार की आड़ में किसी को मरने पर मजबूर किया जा सकता है। नैतिक तर्क यह है कि जीवन को बचाए रखना मनुष्यता का धर्म है, खत्म करना नहीं। स्वेच्छा से जीवन खत्म करने की बहस बहुत पुरानी नहीं है। यह करीब डेढ़ सौ साल पहले शुरू हुई। इसके पहले तमाम समाजों और धर्मों के अपने-अपने नियम थे। उन्नीसवीं शताब्दी में आधुनिकता के आने के बाद जो नियम या कानून बनाए गए, वे ईसाइयत के सिद्धांतों के अनुरूप थे कि जीवन और मृत्यु पर ईश्वर का अधिकार है और मनुष्य का इसमें हस्तक्षेप करना गलत है। इसीलिए तमाम तरक्की के बावजूद बहुत सारे पश्चिमी देशों में गर्भपात अब भी गैर-कानूनी है। आत्महत्या को पाप तो सभी धर्मों और समाजों में माना गया, लेकिन विशेष परिस्थितियों में स्वेच्छा से प्राण त्यागने को कई धर्मों में मान्यता दी गई है। भारतीय धर्मों में इसकी मान्यता है। बीसवीं शताब्दी की दो बड़ी हस्तियों, धर्मानंद कोसांबी और विनोबा भावे ने प्रायोयवेशन करके स्वेच्छा से प्राण त्यागे थे। जैन मुनियों में भी संथारा करके प्राण त्यागने की पुरानी परंपरा है।

आत्महत्या भारत में कानूनन अपराध है, लेकिन धार्मिक कारणों से उपवास करके प्राण त्यागने वालों को आम तौर पर धार्मिक भावनाओं का ख्याल करके नजरअंदाज कर दिया जाता है। बहरहाल, यह विवाद इतना उलझा हुआ है कि आसानी से इसका हल नहीं हो सकता। वैसे डेढ़ सौ साल से चली आ रही यह बहस ब्रिटनी की मौत से फिर ताजा हो गई है।

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