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सुधारें अपनी प्रेजेंटेशन स्किल्स

कार्यस्थलों पर विशेष अवसरों पर दी जाने वाली प्रेजेंटेशंस व्यवसाय और कला का अनोखा मेल होती हैं। इनकी जरूरत किसी भी तरह की बहस से परे है। सच यह भी है कि अधिकांश लोगों में प्रेजेंटेशन स्किल्स की कमी होती है। प्रेजेंटेशंस के महत्व और इससे जुड़ी कमियों को दूर करने के तरीके बता रहे हैं संदीप जोशी


अधिकांश व्यक्तियों के लिए लोगों के बड़े या छोटे समूह के सामने बोलना बहुत मुश्किल होता है। अक्सर ऐसा मौका आने पर लोग बचने की कोशिश करते हैं, परंतु यदि सबके सामने या मंच पर खड़े होकर बोलना ही अंतिम विकल्प हो तो उनकी प्रेजेंटेशन गड़बड़ा जाती है। दरअसल, लोगों के सामने खड़े होकर, मद्धिम रोशनी में, स्क्रीन पर कम्प्यूटर के जरिये पावर पॉइंट  प्रेजेंटेशन देना किसी कला से कम नहीं होता। उस समय सामने बैठे सभी लोगों के आंख और कान प्रेजेंटेशन देने वाले की ओर मुड़े होते हैं। ऐसे में अपनी एकाग्रता बनाए रखने और विषय से न भटकते हुए पूरी बात सफाई के साथ उन तक पहुंचा देने के लिए अच्छे-खासे अभ्यास की जरूरत होती है। अक्सर ऐसा भी होता है कि प्रेजेंटेशन देते समय शुरुआत तो अच्छी होती है, लेकिन बीच में अचानक किसी द्वारा कोई सवाल पूछे जाने पर प्रेजेंटेशन देने वाले की एकाग्रता भंग हो जाती है। सवाल का जवाब देने के बाद उसे अपनी लय टूटी हुई महसूस होती है। फिर शुरू होता है विषय से भटकने का दौर।

कई बार तो यह भी याद नहीं रह पाता कि सवाल पूछे जाने से पहले विषय के किस पक्ष के बारे में बात हो रही थी। इस मुकाम पर कभी-कभी उसे महसूस होता है कि प्रेजेंटेशन समाप्त हो चुकी है। तो क्या उपाय किए जा सकते हैं प्रेजेंटेशन में सुधार के? वैसे तो इस मामले में कई स्तरों पर काम किया जाना चाहिए, लेकिन पहले से की गई कुछ बुनियादी तैयारियां प्रेजेंटेशन स्किल्स के सुधार में बड़ी भूमिका निभाती हैं। याद रखें कि एक बेहतर प्रेजेंटेशन के मुख्य रूप से दो पक्ष होते हैं- अच्छे तरीके से लिखा गया कन्टेंट और उसे बोलने का प्रभावशाली तरीका। इनके अलावा भी कई तरीके हो सकते हैं प्रेजेंटेशन में सुधार के।

आकर्षक और मनोरंजक शैली
सबसे पहले ध्यान रखें कि आपकी प्रेजेंटेशन आकर्षक और मनोरंजक होनी चाहिए, भले ही वह वार्षिक लाभ-हानि के बारे में बताने वाली प्रेजेंटेशन हो। इसी के आधार पर आप सुनने वालों का ध्यान भी अपनी ओर खींच पाएंगे। पर इसका मतलब यह भी नहीं कि आप जरूरी बातें छोड़ कर लतीफे सुनाने शुरू कर दें। दरअसल आपको सुनने वाले आपसे कुछ उम्मीदें बांधे रखते हैं, जिन पर आपको अपनी शैली के जरिए खरा उतरना होता है। बिल्कुल सपाट तरीके से, बिना हास-परिहास के अपनी बात रख देने से आप दर्शकों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाएंगे।

बॉडी लैंग्वेज/आई कॉन्टेक्ट
प्रेजेंटेशन के दौरान कॉन्फ्रेंस रूम में मौजूद लोगों की आंखों में देखना सफलता की पहचान होता है। इस तरीके से आप दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए उनके साथ सीधा संपर्क स्थापित करते हैं। साथ ही आपको दर्शकों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब सोचने के लिए भी कुछ समय मिल जाता है। यदि आप अपनी ओर से कुछ प्रस्ताव रख रहे हैं तो इस मामले में यह भी एक सच है कि प्रेजेंटेशन देते समय आपका पूरा ध्यान केवल नीति-निर्माताओं की ओर ही नहीं होना चाहिए, उनके सहायक आदि भी अक्सर फैसले लेने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनकी ओर देखते हुए भी संबोधन बेहद जरूरी होता है।

स्पष्टता
अपने काम के प्रति उत्साह और प्रेजेंटेशन पूरा करने की जल्दी के कारण अक्सर बेतरतीब शब्द मुंह से निकल जाते हैं। इसलिए यदि आपको महसूस हो कि आप आपकी रफ्तार ज्यादा है तो उसे 50 प्रतिशत धीमा कर दें। दरअसल, धीमे बोलना अन्य फायदों के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करता है कि दर्शक आपकी बात पूरी तरह से समझ सकें।  इससे आपको शब्दों के चयन के लिए पूरा समय मिलता है, आपकी रफ्तार काबू में रहती है और साथ ही आपको सामने उपस्थित लोगों की भाव-भंगिमाओं को परखने का भी मौका मिलता है, जिसके अनुसार आप अपनी प्रेजेंटेशन की रणनीति में जरूरी बदलाव लाते हैं।

माहौल की समझ
किसी भी प्रेजेंटेशन के दौरान अपने काम को छोड़ कर बाहरी वातावरण पर आपका नियंत्रण नहीं होता। आपके सामने बैठे लोग अनजान भी हो सकते हैं, इसलिए जरूरी है कि प्रेजेंटेशन से पहले प्रेजेंटेशन रूम में अभ्यास कर लें। इस दौरान यह जांच लें कि क्या अपनी पावर पॉइंट फाइल तक आपकी पहुंच आसान है? क्या माइक्रोफोन की पहुंच वहां तक है, जहां तक आपको अपनी बात पहुंचानी है? क्या आप अपनी डेस्क को हिला-डुला सकते हैं? क्या आपके खड़े होने का स्थान उचित है? हालांकि इनके अलावा और भी कई बातें ध्यान में रखनी होती हैं, लेकिन अभ्यास के दौरान सब काम आप खुद करके देखें, किसी दूसरे को इसकी जिम्मेदारी न दें। याद रखें प्रेजेंटेशन कोई डराने वाली प्रक्रिया नहीं होती और न ही जरूरत की दृष्टि से यह ऐसी होती है, जिसे आप नजरअंदाज कर सकें।

समय की बचत
अभ्यास के दौरान आपको समय का अंदाजा हो जाता है। इस दौरान यह साफ हो जाता है कि प्रेजेंटेशन कितनी देर तक चलेगी और आपके सामने यह भी स्पष्ट हो जाता है कि बाद में स्टेटमेंट देने और लोगों के साथ बातचीत के लिए कितना समय बचेगा। लिहाजा जहां तक संभव हो, प्रेजेंटेशन रूम में ही अभ्यास करें। इस दौरान आपको प्रेजेंटेशन की समयावधि को भी ध्यान में रखना चाहिए। अगर प्रेजेंटेशन 30 मिनट तक चलने की उम्मीद है तो अभ्यास के दौरान इसे 20 से 25 मिनट तक पूरा करने का प्रयास करें। इस तरह आपको लोगों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों की अवधि का भी सही अंदाजा मिल जाएगा। याद रखें, सामने बैठे लोग यह उम्मीद रखते हैं कि आप उनके समय का आदर करेंगे। यदि आप अपनी प्रेजेंटेशन जल्दी समाप्त कर लेते हैं और उसमें कोई कमी भी नहीं रहती तो इसका बड़ा सकारात्मक असर पड़ता है। इसके विपरीत अधिक समय लेने वाले अपने साथ-साथ लोगों के लिए भी परेशानी का सबब बनते हैं, इसलिए प्रेजेंटेशन सही समय और सही तरीके से समाप्त करने के अपने एजेंडा पर डटे रहें।

प्रेजन्टेशन के दौरान
- आप जो कुछ भी कहें, वह मनोरंजक और ज्ञानप्रद हो।
- जरूरी बिंदुओं पर जोर देने के लिए अपनी बोलने की रफ्तार में बदलाव करें।
- आपकी आवाज स्पष्ट हो। माइक्रोफोन आदि उपकरणों के बावजूद आपको अपनी आवाज सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचानी होती है।
- पावर पॉइंट को देख कर न पढ़ें। आपकी प्रेजन्टेशन का प्रत्येक पक्ष आपको याद होना चाहिए।
- यदि प्रेजेंटेशन लंबी हो तो अपनी बात को समझाने के लिए बीच में छोटी-छोटी कहानियां या व्यंग्य सुना सकते हैं।
- अभ्यास के बावजूद आपके हाव-भाव पहले से अभ्यासरत नहीं दिखने चाहिए। पहले से तय किए गए हाव-भाव कभी-कभी प्रेजेंटेशन के दौरान कहे गए कुछ शब्दों से उलट भी जा सकते हैं।
- किसी बात को समझाने या सवाल के जवाब में अटकने की बजाय सांस लें; यह बेशक कुछ अजीब-सा लगेगा, परंतु दर्शक इस पर ध्यान नहीं देंगे।
- किसी सवाल के जवाब पर सोचने के लिए ‘आपका सवाल अच्छा है’ जैसे जुमले अक्सर काम आते हैं।
- माफी तभी मांगनी चाहिए, जब आपसे कुछ गलत हो जाए, इसलिए बिना मतलब माफी न मांगें। अपनी नर्वसनेस और तैयारी के लिए न मिल पाए समय के लिए तो बिल्कुल भी नहीं।
- अपनी लेटलतीफी या प्रेजेंटेशन के दौरान किसी तार्किक गलती पर जरूर माफी मांगें।
- खुद को अपने श्रोताओं की जगह रख कर देखें। स्पीच लिखते समय उस पर दर्शकों के नजरिए से सोचें कि उन्हें क्या समझ आएगा और क्या नहीं।

एक बेहतर प्रेजन्टर
असरदार प्रेजेंटेशन के लिए कई बातों की जरूरत होती है। आपको अपने श्रोताओं की जरूरतों का अंदाज होना चाहिए। आपके पास पहले से रोचक, संपूर्ण और सबका ध्यान खींचने वाला कंटेंट होना चाहिए। साथ ही उस मैटीरियल को सबके सामने रखने का आत्मविश्वास भी जरूरी है। अपने माहौल की समझ के साथ-साथ आपको यह ध्यान रखना भी आवश्यक होता है कि आपके संदेश का असर अधिकाधिक लोगों तक पहुंचे। आपको सुनने वालों के बारे में सबसे पहले पता लगाना चाहिए कि वे कौन हैं? इसके बाद यह जानना जरूरी होता है कि प्रेजेंटेशन से वे क्या चाहते हैं? उनके लिए क्या सूचना नई होगी और क्या पुरानी? क्या उनकी कुछ विशेष जरूरतें हैं, जिनका आपको ध्यान रखना चाहिए? इसके लिए जरूरी है कि अपनी प्रेजन्टेशन की आउटलाइन आपको स्पष्ट हो। दरअसल, आपको सुनने वाले यदि संतुष्ट होते हैं तो समझिए कि आपकी प्रेजेंटेशन सफल रही।

वहीं अपने कंटेंट को तैयार करना इस पर भी निर्भर करता है कि आप किस किस्म की प्रेजेंटेशन देने जा रहे हैं। फिर भी जरूरी है कि आप मुख्य बिंदुओं की पहचान कर लें। यह जरूरी नहीं होता कि प्रत्येक डिटेल श्रोताओं के सामने रखी जाए। बेहतर प्रेजेंटेशन दर्शकों को विषय के बारे में अतिरिक्त जानकारी देती है, इसलिए जरूरी है कि विषय की आउटलाइन से शुरुआत की जाए। श्रोताओं को बताएं कि आप क्या विषय उठाना चाहते हैं, ताकि उनकी अपेक्षाएं शुरू में ही स्पष्ट हो जाएं। इससे विषय के प्रति कौतुहल भी बना रहता है। एक अन्य तथ्य यह है कि प्रेजेंटेशन की शुरुआत और अंत जोरदार तरीके से हो। यदि शुरुआत में आप श्रोताओं का ध्यान नहीं खींच पाते तो यह आपके पक्ष में नहीं जाता। साथ ही बीच-बीच में रोचक उदाहरण देने भी जरूरी होते हैं। सबसे असरदार कंटेंट तब बिल्कुल बेअसर हो जाता है, जब प्रेजेंटर का स्टाइल उसके अनुरूप न हो। कई लोग प्रेजेंटेशन के दौरान नर्वस हो जाते हैं, जिसका असर उनके बोलने और बॉडी लैंग्वेज पर पड़ता है। यही कुछ रुकावटें हैं, जिन पर काबू पाना जरूरी होता है। आत्मविश्वास बढ़ने के साथ-साथ यह कमियां दूर हो जाती हैं और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए अभ्यास, लचीलापन और अपने कंटेंट की गहरी जानकारी बेहद जरूरी होती है।

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