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उम्मीद की पाइपलाइन

ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की भारत-यात्रा चंद घंटों की थी, किंतु इसके पहले प्रकट की गई कई आशंकाओं को उसने निराधार साबित कर दिया। ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन पर जब पहले बातचीत शुरू हुई थी, तो अमेरिका ने उसका विरोध किया था। कोई समझौता न हो पाए, इसके लिए उसने राजनयिक चैनल के जरिए भारत व पाक दोनों पर दबाव भी बनाया। इस बीच, पाइपलाइन समझौते पर उत्साह दिखाने वाले पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर से उनका विभाग ले लिया गया, तो कइयों को लगा था कि भारत संभवत: अमेरिकी दबाव में आ गया है। ताजा घटनाक्रम साफ दर्शाते हैं कि इस सौदे में न तो भारत की दिलचस्पी घटी, न ही पाक रवैये में फर्क आया है। आईएईए में ईरान के खिलाफ भारत के वोट देने के बावजूद अहमदीनेजाद ने उसे बीते वक्त की बात माना और वह पाइपलाइन समझौते को अंजाम देने के इच्छुक हैं। ईरान जसे पारम्परिक मित्र का साथ भारत खोना नहीं चाहता- भले ही उससे अमेरिका की भृकटियां तन जाएं। अहमदीनेजाद की यात्रा से पहले विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी ने बयान दिया था कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है या नहीं, यह तय करने की जिम्मेदारी अमेरिका की नहीं, बल्कि आईएईए की है। इससे अमेरिका को समझ में आ गया होगा कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेशनीति के पालन व ठोस राष्ट्रीय हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। जिस गति से भारत ने आर्थिक प्रगति की है, उससेउसकी ऊरा जरूरतें काफी बढ़ी हैं। इस लिहाज से ईरान हमार लिए काफी उपयोगी गैस सप्लायर साबित होगा। ऊरा जरूरतों की पूर्ति के लिए भारत सिर्फ ईरान ही नहीं, रूस व अफ्रीका के दूरवर्ती स्रोतों पर भी ध्यान दे रहा है। अमेरिका ने ईरान के बजाय तुर्कमेनिस्तान से गैस पाने की भारत को सलाह दी है, पर हमारी एनर्जी डिप्लोमेसी सभी स्रोतों से उसे पाने की है। अमेरिका व यूरोपीए देश अपने भीतर झांककर देखें कि वे किस बेहिसाब मात्रा में तेल व गैस को निगलते जा रहे हैं और हरसंभव स्रोत के इस्तेमाल से नहीं चूकते। विश्व में रूस के बाद ईरान दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार है और वह बड़ी मात्रा में हमारी जरूरतें पूरी करने में सक्षम है। ईरान एक बड़ी क्षेत्रीय शक्ित के रूप में उभरा है, और इस्लामिक संदर्भ में देखें, तो उसने ओर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कन्ट्रीा में कश्मीर जसे नाजुक मसले पर भारत का सदैव साथ दिया है। क्या इन हकीकतों को नारअंदाज किया जा सकता है?

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