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अधिकार का दायरा

यायपालिका लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। लोकतंत्र में राज्य के सभी अंगों की अंतिम जवाबदेही जनता के प्रति होती है। सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) जवाबदेही तय करने का महत्वपूर्ण औजार है, ऐसे में न्यायपालिका आरटीआई की जद से कैसे बच सकती है? यूं भी न्यायपालिका पर दोहरी जिम्मेदारी होती है। पहली अदालती फैसले सुनाने से संबंधित और दूसरी प्रशासनिक। कानूनी फैसले खुली अदालत में सुनाए जाते हैं, इसलिए उन पर आरटीआई लागू करने की कोई आवश्यकता नहीं है, किंतु न्यायाधीशों की नियुक्ति, व्यक्तिगत सम्पत्ति, उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप आदि मुद्दे प्रशासनिक अथवा व्यक्तिगत जानकारी के अंतर्गत आते हैं और जनता को इनसे जुड़ी सूचना पाने का पूरा अधिकार है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.ाी. बालाकृष्णन का मत है कि उनका पद संवैधानिक है, इसलिए आरटीआई कानून उन पर लागू नहीं होता। इस हिसाब से तो प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष को भी आरटीआई से मुक्त रखा जाना चाहिए, किन्तु दोनों पर आरटीआई लागू होता है। संसद की कार्मिक, विधि और न्याय संबंधी स्थायी समिति ने न्यायपालिका के प्रशासनिक व व्यक्तिगत मामलों को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाने की सिफारिश कर टकराव का मार्ग नहीं अपनाया है। समिति ने आरटीआई के समस्त प्रावधानों का गहरा अध्ययन करने के बाद ही यह सिफारिश की है। प्रशासनिक निर्णय पर पारदर्शिता बरतने से न्यायपालिका की साख ही बढ़ेगी। व्यवस्था खुली होने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना आसान हो जाता है। आशा है, न्यायपालिका इस बार में सकारात्मक रुख अपनाएगी। न्यायाधीशों की नियुक्ति के वर्तमान तरीके से भी स्थायी समिति संतुष्ट नहीं है। अच्छा हो उच्चतम न्यायालय की सहमति से नियुक्ति प्रणाली ज्यादा खुली और तर्कसंगत बनाई जाएगी। जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति गहरा सम्मान भाव है जिसे बनाए रखना सबका उत्तरदायित्व है। आरटीआई पर टालमटोल भरा रवैया अपनाने से आम आदमी के कान खड़े हो जाते हैं। आशा है यह नौबत नहीं आएगी।

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