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आसान नहीं नफरत की दीवार गिराना

शिया रहनुमा कल्बे सादिक अगली ईद की नमाज़ लखनऊ की सुन्नी ईदगाह में, सुन्नी इमाम के पीछे पढ़ेंगे। उनके इस ऐलान से पूरा मुस्लिम समाज सकते में आ गया। ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था। क्या यह मुमकिन है, तरह-तरह के क़यास लगाए जा रहे हैं। सुन्नी मुसलमानों के फिरकों में बयानबाज़ी शुरू हो गई। देवबंदी, बरेलवी, अहले-हदीस, बोहरे, खोजे, अहले-सुन्नत जमात, कादियानी और न जाने कितने हैं। सारे फिरकों के मौलवी कल्बे सादिक के इस ऐलान पर बग़लें झांक रहे हैं। क्यांकि ये आपस में एक-दूसरे को फूंटी आंख नहीं भाते। कोई एक-दूसरे की मस्जिद में नहीं जाता। गुजरात में तो हर मस्जिद के दरवाो पर ही लिखा है कि यह मसिद किस फिरके की है। गुजरात में मुसलमान सब से ज्यादा 81 फिरकों में बंटे हैं। आमतौर पर इस्लाम के 72 फिरके ही माने जाते हैं। मुसलमानों में त्रिस्तरीय फिरका या जातीय सिस्टम कायम है। सबसे पहले अरब और अजम, फिर अशराफ और अजलाफ, और इसके अंदर हिन्दू वर्णाश्रम की तर्ज पर तैयार की गई जाति-व्यवस्था, जिसमें शेख, सैयद, पठान वगैरह आते हैं। इनके अलावा अन्य सभी पिछड़ी जाति में आते हैं। यह जाति व्यवस्था अलग-अलग आस्थाओं पर बंटे फिरकों जैसे देवबंदी-बरेलवी पर हावी नहीं होती, यहाँ पर मामला सिर्फ शिया-सुन्नी का है। कल्बे सादिक ने सुन्नियों के नेतृत्व में नमाज़ पढ़ने का ऐलान ऐसे वक्त में किया, जब शिया-सुन्नी के बीच दूरी वाकई बहुत बढ़ चुकी है। अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया लगातार शियों के सुन्नियों पर हावी होन की कोशिशों को सराह रहा है। शुरुआत इराक से ही हुई। इराक पर अमेरिकी फौजी कार्रवाई ने बााहिर सिर्फ इराक को बर्बाद किया है, पर दरअसल इराक के बहाने उसने पूरी दुनिया में शिया-सुन्नी के बीच खाई को चौड़ा कर दिया है। इराक में अमेरिकी फौज की चार साल की मौजूदगी ने दोनां के बीच इतनी नफरत पैदा कर दी है, जितनी ग्यारह साल चली ईरान-इराक जंग ने भी नहीं पैदा की थी। बगदाद तो ऊपर से ही एक शहर बचा है। अंदर दो समाज बसते है। एक शिया-दूसरा सुन्नी। इराक के परिवारों का ढांचा ही बदल गया। मध्य बगदाद की शरीयत कोर्ट में अब शिया-सुन्नी शादियां सिर्फ पांच फीसदी हो पा रही हैं। अमेरिकी हमले से पहले ऐसी शादियों की तादाद पचास फीसदी हुआ करती थी। अमेरिकी हमल के बाद एक साल तक सब ठीक रहा। उसके बाद शिया-सुन्नी दंगे-झड़पें शुरू हुईं। नतीजा यह कि कर्बला में बंसे शिया शरणार्थियों में 47 फीसदी अपने पड़ोसी सुन्नी के सताए हुए हैं। मेहदी आर्मी शुरू मे तो शियों की हिफाात के तौर पर उभरी, बाद में हर मरे हुए सुन्नी की प्रापर्टी पर पहला हक मेहदी आर्मी का होने लगा। यह आर्मी इतना आगे बढ़ी कि फिर उसने लूट-मार में शिया-सुन्नी का फर्क ही खत्म कर दिया। अमेरिकी सेना फिलहाल मेहदी आर्मी से जूझ रही है। लगभग दस लाख 33 हाार इराकियों और चार हज़ार से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की जान गंवा देन के बाद, मुस्लिम दुनिया को जो हासिल हुआ है, वह है शिया-सुन्नी के बीच नफरत। इराक में लोगों ने शिया-सुन्नी सरनेम लिखना बंद कर दिए हैं। नफरत और हिंसा से बचन का अब यही रास्ता है। लड़कियां और बच्चे ऐसा आसानी स करने लगे हैं। स्कूल हो या अस्पताल या फिर डिपार्टमेन्टल स्टोर, इराकियों के जहन में बन चुकी सीमा रेखा उनके व्यवहार में साफ झलकती हैं। फुटबाल क्लबों में कभी शिया-सुन्नी के तौर पर पहचान बन जान को शर्म माना जाता था। पर अब यही सबसे बड़ी सच्चाई है। यह नफरत और बंटवारा बगदाद और इराक से निकलकर पूरी दुनिया में फैलता जा रहा है। जा काम अमेरिका ने इराक में किया है, वही इस्रईल ने फिलिस्तीन में किया है। वहाँ हिज्बुल्लाह और हयास के बीच लड़ाई फिलहाल थमी हुई है। हिज्जबुल्लाह फिलिस्तीनी शियों का उग्रवादी संगठन है तो हमास सुन्नियों का। हिज्बुल्लाह को ईरानी रिव्ल्यूशन आर्मी ने ट्रेंड किया है। पाकिस्तान में भी शिया-सुन्नी दंगां का लम्बा इतिहास रहा है। जुल्फिकार अली भुट्टो और फिर बेनज़ीर के प्रधानमंत्री बनने से वहाँ शिया राजनीति में काफी उभार आया। जि़याऊल हक के ज़माने में शियों पर जुल्म भी काफी हुए। पिछले दिनों सूबा-सरहद पर शिया-सुन्नी झड़प हो चुकी है। पैगम्बर मोहम्मद साहब ने अपना स्वाभाविक उत्तराधिकारी अपने दामाद हज़रत अली को माना था। ऐसा मानना है शिया हज़रात का। लकिन मोहम्मद साहब ने अपनी जिंदगी में ही अपने ससुर हज़रत अबू बक्र सिद्दीक को पहला खलीफा नामित कर दिया था। यानी सत्ता हस्तान्तरण सत्ता संघर्ष में बदला। कालांतर में इसी ने धार्मिक आस्था और विश्वास की शक्ल अख्तियार कर ली। शिया एक अलग फिरका और किसी की निगाह में अलग मज़हब ही बन गया। मुसलमानों में शिया सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग है। लकिन वह प्रभावशाली बहुत है। मुसलमानों में 10 से15 फीसदी शिया हैं और बाकी सुन्नी। अनुमान यह है कि दुनिया भर में शिया आबादी 13 से 1रोड़ के बीच है। लकिन शिया पूरी दुनिया में फैले हैं। भारत की बात करें तो सबसे अहम शिया केन्द्र लखनऊ को कहा जा सकता है। लखनऊ की बुनियाद शिया नवाबों ने रखी। वाजिद अली शाह तक यहाँ शियों का राज रहा, इसकी ‘नवाबों का शहर’ की पहचान दरअसल शिया पहचान है। पिछले सौ वर्षो में करीब पच्चीस शिया-सुन्नी दंगे यहां हो चुके हैं । इन हालात में लखनऊ के ही धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक की सुन्नियों के साथ नमाा पढ़ने की पहल के नतीजे क्या होगें, कोई नहीं जानता, लकिन यह कदम काबिले तारीफ जरूर है। यूरोप में मस्जिदें घरों में बनी हैं। वहा हनफी, हमबली, शाफई, शिया, बोहऱे.़.़़़ कोई पूछता भी नहीं कि कौन मुसलमान हो, सब साथ पढ़ते है। पिछली ईद की नमाा बॉन (जर्मनी) में मैंने बारह तकबीरों के साथ पढ़ी। जबकि भारत में छह तकबीरों से पढ़ी जाती है। कल्बे सादिक का कहना है कि आपसी एकता और भाईचारा ही उनका मिशन है। पर यह मिशन आसान नहीं है इसे वे खुद भी जानते-समझते होंगे। उन्हें एक ऐसी नफरत से निपटना है, जो अतीत से निकली है और वर्तमान तक चली आई है। इसके साथ एक इतिहास भी जुड़ गया है और राजनीति भी। यह नफरत हर जगह है, लेकिन फिलहाल वे इसे लखनऊ और भारत के पैमाने पर हल करना चाहते हैं। इस काम में उन्हें कितनी कामयाबी मिलेगी, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन उनकी मंशा और मकसद स्वागतयोग्य है। लेखक जर्मन रेडियो डॉयचे वैले से जुड़े हैं

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