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दलित वोट बैंक का ठेका

दलित वोट बैंक पर किसी एक नेता का चाहे फिर वह दलित ही क्यों न हो, एक छत्र अधिकार नहीं। यह तो वोटर की मर्जी है कि वह अपना वोट किसे दे। फिर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों के दौरों के दौरान वहां के दलित परिवारों से घुलने-मिलने से क्यों बौखला जाती हैं? क्या दलित वोट खिसकने के भय से?ड्ढr एस. एस. अग्रवाल, दयालबाग, आगरा स्वरोगार सबसे अच्छा बेरोगारी की समस्या के निदान में स्वरोगार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्वव्यवसाय में ज्यादा से ज्यादा मेहनत करके बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। आज सिर्फ रोगार-सृजन की नहीं, बल्कि रोगार प्रबंधन की भी जरूरत है। युवाओं को तकनीकी ज्ञान से लैस कर रोगारोन्मुखी बनाया जा सकता है। तकनीकी शिक्षा में रोगार की असीम संभावनाएं सन्निहित हैं। तकनीकी ज्ञान से युवाओं का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।ड्ढr अमल कुमार, बरसौनी, पूर्णिया, बिहार चीन के बढ़ते पंजे तिब्बत के संघर्ष में जुटी आम जनता को भारतीय जनमानस का बौद्धिक समर्थन है। होना ही चाहिए। चीन तो बंदूक की सत्ता में शुरू से ही विश्वास करता रहा है और अब तो वह पूंजीवादी भी हो चला है। कूटनीतिक मोर्चे पर मात देकर ही भारत अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा कर सकता है, वरना चीन आज तिब्बत कल ताइवान तो परसों अरुणाचल को भी ‘लील’ सकता है।ड्ढr नीलाम्बुज सिंह, नई दिल्ली अभी बवाल खत्म नहीं हुआ ‘हिन्दुस्तान’ के मुख्य पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में लिखा ‘निकली मशाल खत्म बवाल’। क्या बवाल खत्म हो गया? सार संसार में आज धीर-धीर सार देश आजाद हो रहे हैं फिर तिब्बत पर चीन का कब्जा और उसका समर्थन क्या सही कहा जाएगा?ड्ढr जगदीश कुमार खन्ना, नई दिल्ली कहीं कुछ खामी जरूर है समाज में अपराध न हो, इसके लिए असामाजिक तत्वों को कानून, पुलिस, जेल का खौफ रहना चाहिए। लेकिन इस व्यवस्था को धता बताते हुए अपराधी बेखौफ रहें तो यही कहा जाएगा कि कहीं कुछ खामी जरूर है। अब हो यह रहा है कि अपराधी मौके पर पकड़े जाते हैं तो भीड़ ही उन्हें सजा देती है। जब भीड़ ही इंसाफ करने लगेगी तो कानून और पुलिस का क्या होगा?ड्ढr दिलीप कुमार गुप्ता, छोटी वमनपुरी, बरेली कारगर हथियार सूचना का अधिकार एक ओर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का कारगर हथियार तो है, पर लोक सेवकों के लिए समस्या उत्पन्न कर दी गई है। जसे- सूचना देने में आए खर्च को जमा करने के लिए प्रपत्र ‘ग’ के द्वारा आवेदक को सूचित करना है। जमा किए गए शुल्क को उसी रूप में वित्त विभाग द्वारा विहित संबंधित बजट शीर्ष में जमा कर देना है। जब शुल्क सरकार के खजाने में जमा हो जाएगा तो फिर आवेदक को छाया-प्रति करके जो सूचना दी जाएगी, उसके लिए राशि कहां से आएगी। इस पर अधिनियम मौन है। एक ईमानदार लोक सेवक अपनी जेब से कैसे और कब तक खर्च कर सकता है। जरूरत है, सूचना देने के लिए सभी कार्यालय को अलग से फंड की, ताकि वे आसानी से सूचना दे सकें। संजय कुमार मिश्र, मनेर, दानापुर, पटना

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