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मन की शुद्धि

महाभारत के बाद पांडवों ने आत्म-शुद्धि के लिए तीर्थयात्रा करने का निर्णय किया। वे श्रीकृष्ण के पास विदा लेने के लिए गए। कृष्ण ने विदा देते हुए उन्हें एक तुंबी सौंपी और कहा- ‘तुम लोग जिन-ािन तीर्थो पर स्नान करो, उनमें इसको भी स्नान करवा देना।’ पांडव लंबी तीर्थ यात्रा कर वापस आए और उन्होंने तुंबी श्रीकृष्ण को सुपुर्द की। श्रीकृष्ण ने पांडवों के सामने ही तुंबी को काटकर उसका एक छोटा-सा टुकड़ा मुंह में डाला और एकदम कड़वाए मुंह की भाव-भंगिमा बनाते हुए उसे थूक दिया। इसके साथ ही वे पांडवों से बोले- ‘ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों ने इस तुंबी को तीर्थो में स्नान नहीं करवाया है, अन्यथा इतने तीर्थो में डुबकियां लगाकर भी यह कड़वी कैसे रहती? पांडव बोले- ‘प्रभो! हमने इसे सभी तीर्थो में नहलाया है, पर नहलाने पर भी यह तो कड़वी ही रहेगी। मीठी कैसे होगी?’ छूटते ही श्रीकृष्ण बोले- ‘फिर तीर्थो में नहाने से तुम लोगों की आत्मा शुद्ध कैसे होगी?’ नहाने-धोने से बाह्य शुद्धि तो हो सकती है, पर शरीर के अंदर भरी तरह-तरह की अशुचि समाप्त नहीं हो सकती। फिर एक बात और भी तो है, शरीर की प्रकृति की कुछ ऐसी है कि अच्छे-से-अच्छे भोजन का भी खून, वीर्य, मल, मूत्र, कफ आदि के रूप में परिणमन हो जाता है फिर ये ही पदार्थ अशुचि के रूप में जब शरीर के विभिन्न स्रेतों से बाहर आते हैं तो व्यक्ित उनसे घृणा करने लगता है। शरीर की इस प्रकृति और स्थिति को यदि व्यक्ित सही रूप में पहचान ले तो शरीर के प्रति आसक्ित को टूटने में बहुत सुगमता होती है। शरीर का स्वरूप और प्रकृति जसी है, वैसी है। हर सुखेच्छु व्यक्ित को चाहिए कि वह इस शरीर का मात्र भोग में ही उपयोग न कर, अपितु एक सीमा तक योग में भी सदुपयोग कर। भोग पर योग और संयम का अंकुश रखे। इस सीमा तक कि भोग-विरति भी उसे काफी अंश में दु:खों से बचा सकती है।ंं

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