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क्षेत्रीय दलों की विदाई के बाद

पिछले लोकसभा चुनाव और उसके बाद हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जिस तरह क्षेत्रीय दल कमजोर हुए, उससे देश की राजनीति एक नए मोड़ पर आ गई है। आने वाले दिनों में देश के संघीय ढांचे पर इसका बड़ा असर दिखाई दे सकता है। अभी भारत में 1,766 पंजीकृत राजनीतिक दल हैं, जिनमें छह राष्ट्रीय दल हैं और 54 राज्य स्तरीय पार्टियां हैं। पिछले आम चुनाव के बाद तीन राष्ट्रीय दलों- बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- की राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता अब समाप्त होने वाली है। किसी भी पंजीकृत दल को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता तभी मिलती है, जब वह तीन में से किसी एक शर्त को पूरा करता है- यदि उसे लोकसभा की दो प्रतिशत यानी 11 सीटों पर कम से कम तीन राज्यों में सफलता मिलती है या लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कम से कम चार राज्यों में उसे छह प्रतिशत मत मिलते हैं और साथ ही कम से कम चार लोकसभा सीटों पर उसके प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं, या कम से कम चार राज्यों में उसे क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता मिली हो।

देश में जब पहला आम चुनाव हुआ था, तब यहां 14 राष्ट्रीय दल थे, बावजूद इसके पूरे देश में कांग्रेस का दबदबा था, जो 1967 तक पूरी तरह बना रहा। उस समय भारतीय बोल्शेविक पार्टी, रामराज्य परिषद तथा कृषिकर लोक पार्टी जैसे दल थे, जिनका आज कोई नाम भी नहीं जानता। कांग्रेस का प्रभाव इतना व्यापक था कि रजनी कोठारी जैसे राजनीति शास्त्री भारत की राजनीतिक व्यवस्था को कांग्रेस सिस्टम कहते थे। उनके अनुसार, एक दल का वर्चस्व होने के बावजूद लोकतंत्र जीवंत था। कांग्रेस के वर्चस्व की परिणति अंतत: सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीतिक अहंकार में हुई। संविधान के अनुच्छेद-356 का व्यापक दुरुपयोग करते हुए कांग्रेस सरकारों ने विरोधी दलों की राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त किया। निर्विवाद नेता के रूप में उभरने के बाद इंदिरा गांधी ने 1971 में पार्टी के आंतरिक चुनाव को खत्म कर दिया और राज्यों के मुख्यमंत्रियों का निर्वाचन विधायक दल के जरिये न होकर केंद्रीय नेतृत्व की मनमर्जी से होने लगा। कांग्रेस की इस परभक्षी प्रवृत्ति ने राज्यों को केंद्र का दुश्मन बना दिया। अपनी उपेक्षा और अपमान से उपजे आक्रोश का जवाब कई राज्यों के जनमानस ने क्षेत्रीय दलों के रूप में दिया, जिन्हें लोकसभा और विधानसभा चुनावों में व्यापक सफलता मिलने लगी।

जिस संघीय ढांचे को कांग्रेस सरकार ने तहस-नहस कर दिया था, वह आक्रामक तरीके से फिर से एक नए रूप में उभरा, जिसे संघवाद की जगह राज्यों का परिसंघ कहना अधिक उपयुक्त होगा। यह अमेरिका में कॉन्टिनेंटल कांग्रेस द्वारा बनाए गए आर्टिकल्स ऑफ कंफेडरेशन (1777) की याद दिलाता है, जिसमें प्रदेश इतने मजबूत हो गए कि राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन पूरी तरह से बंध गए और कुछ कर ही नहीं पाए थे। यह होली रोमन एंपायर के पतन के बाद हुई वेस्टफैलिया संधि (1648) के तहत स्थापित हुए यूरोपीय देशों के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। वेस्टफैलियाई राज्य एकीकृत संप्रभुता, एकीकृत क्षेत्रीयता और उग्र भाषायी राष्ट्रवाद पर आधारित है। अमेरिका ने 1777 के संविधान की असफलता से सीख लेते हुए 1787 में फिलाडेल्फिया अधिवेशन में एक संघीय संविधान की संरचना की, जिसमें संघीय सिद्धांतों के तहत केंद्र को ज्यादा शक्ति दी गई। पिछले कुछ समय में भारत में क्षेत्रीय दल इतने मजबूत हो गए कि केंद्र सरकार के बनने और गिरने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई थी। प्रधानमंत्री अति उत्साहित क्षेत्रीय नेताओं के फरमान मानने को बाध्य हो गए। इन दलों के नेता तय करते थे कि उनके प्रतिनिधियों को कौन-सा मंत्रालय सौंपा जाए। कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी अमुक मंत्रालय को रिक्त रखा गया, ताकि भविष्य में किसी क्षेत्रीय दल के प्रतिनिधि को उसे सौंपा जा सके।

इस दबाव को गठबंधन धर्म जैसे नाम भी दिए गए। भले ही इसका अर्थ कई बार केंद्र सरकार को ब्लैकमेल करना तक होता था। हालांकि इसने संघवाद को शक्ति दी, किंतु इससे केंद्र कमजोर हुआ। हाल के चुनाव परिणाम से लोगों का रुझान साफ झलकता है कि फिलहाल वे कुछ गिने-चुने दलों के पक्ष में लामबंद हो रहे हैं। इससे यह नतीजा भी निकाला जा सकता है कि भारत में दो-ध्रुवीय राजनीतिक व्यवस्था आकार ले रही है। परंपरागत रूप से ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी तथा लिबरल पार्टी एक-एक करके शासन में रही हैं। लेबर पार्टी लिबरल पार्टी से निकली है। लेकिन अब वहां सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी है तथा स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी हैं। ब्रिटेन में क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति प्रदेशों को कम शक्ति व स्वायत्तता देने के कारण हुई है। इसका प्रमाण है 1921 में आयरलैंड का ब्रिटेन से अलग होना तथा ब्रिटेन से अलग होने के मुद्दे पर स्कॉटलैंड में हुआ जनमत संग्रह। हालांकि ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में संघवाद को प्रोत्साहन दिया, मगर उसने अपने यहां ऐसा नहीं किया।

फ्रांस की स्थिति भिन्न थी, जिसने उपनिवेशों को मुख्य भू-भाग का ही विस्तार माना। अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी ही हैं, जो बारी-बारी से सत्ता में आती हैं। कनाडा में लिबरल पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी मुख्य हैं, जिनकी केंद्र में अलग-अलग समय पर सरकार रही है। वैसे वहां न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी की भी संसद में लगातार उपस्थिति रही है, परंतु केंद्र में कभी उसकी सरकार नहीं बनी, हालांकि प्रदेशों में उसकी सरकार रही है। भारत में बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों के उभार का एक दुष्परिणाम यह हुआ कि हर छोटा-मोटा दल सरकार को ब्लैकमेल करने की स्थिति में आ गया। कई दल तो ऐसे हैं, जो सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर हैं, तो कुछ का आधार संप्रदाय विशेष है। जब बड़ी पार्टियां समाज के सभी तबके के हितों का ख्याल नहीं रखती हैं, तो छोटे-मोटे गुट भी पार्टी बनाते हैं।

आज की राजनीति हावड़ा पुल की तरह जातिवाद और वंशवाद के दो पायों पर आधारित है। एक पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने से जहां छोटे-छोटे दलों की सौदेबाजी की क्षमता लगभग खत्म हो गई है, वहीं यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के संघीय ढांचे को कोई आंच नहीं आएगी, जैसा पहले केंद्र में मजबूत सरकार होने पर होता था। यह उम्मीद इसलिए भी बंधी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मुख्यमंत्री रह चुके हैं और वह सत्ता के उन समीकरणों को अच्छी तरह समझते हैं, जो अक्सर केंद्र व राज्य के बीच तनाव का कारण बनते हैं और कभी-कभी तो राज्यों के आगे बढ़ने के रास्ते भी रोकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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