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हिमालय के पास ही है निर्मल गंगा की कुंजी

गंगा की सफाई को लेकर होने वाले प्रयासों में फिर से तेजी आई है। गंगा में जल की अविरलता, निर्मलता बनी रहे, इस बात पर किसी को शायद कोई आपत्ति नहीं है। फिर क्यों ऐसे प्रयास बीच में ही दम तोड़ देते हैं? ऐसा कोई भी प्रयास तब तक अधूरा ही रहेगा, जब तक कि गंगा जहां से आती है, उस हिमालय के प्रति हम अपनी गंभीरता नहीं दिखाते। हिमालय से निकलने वाली गंगा और उसको पोषित करने वाले हजारों गाद-गदेरों, छोटी नदियों, जलस्रोतों, जल धाराओं आदि के प्रति एकीकृत दृष्टि बनाने का समय आ गया है। गंगा के स्वच्छ और स्वस्थ रहने की पहली शर्त है हिमालय का स्वच्छ और स्वस्थ रहना। यह पूरे देशवासियों के लिए भी उतना ही जरूरी है, जितना कि उन लोगों के लिए, जो हिमालय की गोद में बसे हैं। हिमालय की संवेदनशीलता को भुलाकर हम निर्मल गंगा की उम्मीद नहीं कर सकते। एकीकृत सोच का अभाव आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है।

सन 1994 से 2014 के बीच में हिमालय क्षेत्र में 30 से अधिक बार बाढ़, भूस्खलन, भूकंप की विनाशकारी घटनाएं घट चुकी हैं। इस हिमालयी सुनामी का खौफ छह-सात सितंबर को जम्मू-कश्मीर और पिछले साल 16-17 जून को केदारनाथ, गंगोत्री व बद्रीनाथ में देखा जा चुका है। देश के सभी हिमालयी राज्य भूकंप के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। इस पर्यावरणीय संवेदनशीलता के बावजूद यहां नदियों के उद्गम क्षेत्रों में 1,000 से अधिक सुरंग बांध प्रस्तावित व निर्माणाधीन हैं। नदी बचाओ अभियान ने इन बांधों से प्रभावित लोगों का अध्ययन करके पाया कि यहां की बस्तियां धीरे-धीरे नदियों की तरफ खिसक रही हैं। सुरंग बांधों के ऊपर बसे गांव के मकानों में दरारें आ रही हैं। जलस्रोत सूख रहे हैं। हिमालय के बारे में चिंता है कि यहां पर विकास के सारे मानक मैदानी हैं। अलग हिमालयी जैव-विविधता, संस्कृति, पर्यटन के लिहाज से भी सबसे अधिक लाभ मैदानी क्षेत्रों को ही मिलता है।

देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 16.3 प्रतिशत भाग में फैले हिमालयी क्षेत्र को समृद्ध जल टैंक के रूप में माना जाता है। इसमें 45.2 प्रतिशत भू-भाग में घने जंगल हैं। यहां नदियों, पर्वतों के बीच में निवास करने वाली जनसंख्या के पास हिमालयी संस्कृति और सभ्यता को अक्षुण्ण बनाए रखने का लोक विज्ञान मौजूद है। हिमालय क्षेत्र में आमतौर पर 11 छोटे राज्य हैं, जहां से सांसदों की कुल संख्या 36 है, लेकिन अकेले बिहार में 39, मध्य प्रदेश में 29, राजस्थान में 25 तथा गुजरात में 26 सांसद हैं। यानी देश का मुकुट कहे जाने वाले हिमालयी भू-भाग की सांस्कृतिक-सामाजिक- राजनीतिक पहुंच संसद में भी कमजोर है, जबकि सामरिक और पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील हिमालयी राज्यों को पूरे देश और दुनिया के संदर्भ में भी देखने की आवश्यकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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