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इस दुनिया में इतना सधा हूं कि सचमुच गधा हूं

इधर कुछ दिनों से मेरी सोच, मेरी हरकतों में गधेपन की मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। मसला चाहे सामाजिक हो या साहित्यिक या फिर आर्थिक, मैं अपने गधेपन का परिचय दे ही देता हूं। अभी उस रोज भरी सभा में मैंने कह दिया कि ‘मैं समाज को अपने दम पर हांकना चाहता हूं। साहित्य को दुलत्ती मारना चाहता हूं। आर्थिक समस्या को अपनी पीठ पर ढोना चाहता हूं।’ एक बंदे ने खीझकर कहा, ‘बंधु, आपकी सोच में गधापन है। जाकर जानवरों के किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाएं।’ वैसे, मेरी बीवी भी यही कहती है। मैं बीवी के कहे पर ज्यादा कान इसलिए नहीं देता था कि वह फेंकती है। लेकिन उस बंदे की झाड़ ने अब मुझे सौ फीसद यकीन दिलवा दिया है कि मैं वाकई गधा हूं। साथ ही, मैं यह भी मानने लगा हूं कि पतियों के बारे में बीवियों की राय हर वक्त ‘गलत’ नहीं होती प्यारे।

अब मैं गधा होने को बेहद ‘सहजता’ से लेता हूं। इंसानों के बीच अकेला मैं ही हूं, जो गधा प्रजाति के काफी करीब है। वरना किसी बंदे से कहकर देख लीजिए ‘गधा’ या ‘कुत्ता’, कसम से आपके सिर पर सवार हो बैठेगा। कुछ लोग तो ‘पागल’ शब्द पर ही बिदक से जाते हैं। पर मैं गधा होने का भी बुरा नहीं मानता। मैं खुद को कृश्न चंदर की एक गधे की आत्मकथा  के बेहद नजदीक पाता हूं। यह कृश्न चंदर ही थे, जिन्होंने गधे को इत्ती इज्जत बख्शी कि वह ‘सुपर-हीरो’ बन गया। मुझे तो जहां भी कोई गधा नजर आता है, बेहद श्रद्धा के साथ उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता हूं। उससे गुजारिश करता हूं कि प्यारे, अपने गधेपन का असर मुझ पर कायम रखना। मैं अपने भीतर गधापन सबसे ज्यादा तब महसूस करता हूं, जब पारंपरिक रूढ़ियों और मानसिक यथास्थितिवाद को ढोते-ढोते मेरी पीठ जवाब दे जाती है। इस पर से तुर्रा यह कि गधा होकर गधेपन के साथ रहने में मुङो आनंद आता है। इसीलिए मैं अपनी इस खूबी को हमेशा बरकरार रखना चाहता हूं। उस माहौल को भी, जो मेरे गधा बनने में तन-मन-धन से पूरा सहयोग देता है। आपको क्या लगता है? क्या मैं ऐसा अकेला गधा हूं?

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