DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

श्रम की राह

परिश्रम और निरंतर अभ्यास से कठिन समझे जाने वाले कार्य भी सरल हो जाते हैं। ज्ञान, भाव और कर्म से संबंधित सभी क्षेत्र में इसका चमत्कार देखा जा सकता है। क्षमताएं, ज्ञान और रचनात्मकता का मेल जब श्रम के साथ होता है, तब सफलता की एक नई इबारत लिखी जाती है। ऐसा श्रम, जो खुद को भी संतुष्टि न दे पाए, ज्यादा समय तक फलदायी नहीं होता। प्रेरणा का स्रोत तो हमारा अंतर है। बाह्य आवरण से किया गया श्रम सिर्फ जीविका का साधन उपलब्ध करा सकता है, सफलता की ऊंचाइयों तक वह नहीं पहुंचा सकता। मन, वचन और सहृदयता से किया गया श्रम सफलता तक न पहुंचे, यह नामुमकिन है। अपने प्रयोजन में दृढ़ विश्वास रखने वाला व्यक्ति इतिहास रच सकता है। श्रम में सबसे महत्वपूर्ण यह होता है कि उसे किस मंजिल की तलाश में किया जा रहा है। श्रमजीवी थोड़ी देर के लिए परास्त हो जाए, पर उसकी सफलता का सूर्यास्त कभी नहीं हो सकता। एक बड़ा वर्ग-समुदाय इसमें लगकर केवल अपना भरण-पोषण, अपितु पूरे देश का कल्याण करता है। पर व्यक्तिगत स्तर पर अपने श्रम से जो परहित करता है, वही श्रमजीवी होता है।

दशरथ मांझी का उदाहरण लीजिए, जिन्होंने पहाड़ को अपने बलबूते काटकर सड़क बना डाली। वह सड़क उनके गांव की रीढ़ है। अपने श्रम के पीछे परोपकार और जनहित की भावना को ही सर्वोपरि रखना चाहिए। जिस काम को करने में आंतरिक खुशी मिलती हो, उसमें सफलता निस्संदेह मिलती है, क्योंकि खुशी से सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इस रास्ते पर चलने वाला श्रमजीवी कभी निराश नहीं होता। जरूरी है कि हम श्रम के महत्व को पहचानते हुए कर्म के पथ पर लगातार बढ़ते रहें। अपने मनोयोग और तल्लीनता में शेर की प्रवृत्ति रखना सबसे कठिन शर्त है, यह नहीं कर पाए, तो लक्ष्य के शिकार पर हम अपना अधिकार कभी नहीं जता पाएंगे। वह हमारे हाथ भी नहीं आएगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:श्रम की राह