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शाकाहार बनाम मांसाहार

भारत इन दिनों विचित्र बहसों में उलझा है। ऐसी बहसें सबसे ज्यादा संस्कृति, इतिहास व शिक्षा के क्षेत्र में उठ रही हैं। नया विवाद इस पर है कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में शाकाहार और मांसाहार की अलग कैंटीनें होनी चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मुखिया स्मृति ईरानी को ऐसी शिकायतें मिली हैं, जिनके आधार पर आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से जवाब-तलब किया गया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और शुद्धतावाद के पैरोकार संघ का अभियान यूं तो वर्षों पुराना है, पर अब उसे एक नई गति मिल गई है, क्योंकि उसकी ही राजनीतिक इकाई अब हुकूमत चला रही है। खबरों के मुताबिक, इन संस्थानों में पढ़ने वाले कई छात्र भी उद्वेलित हैं। उनका कहना है कि कैंटीन अलग-अलग करने की बात तो किसी के जेहन में है ही नहीं और शाकाहारियों की भावना का ख्याल रखा ही जाता है।

तो इस तरह का अलगाव प्रतीकात्मक तौर पर दूरगामी असर क्या डालेगा? बात सिर्फ भोजन शैलियों की नहीं है, यह तो धीरे-धीरे एक नए सांस्कृतिक विलगाव को जन्म देगा। सोचिए, भारत जैसे अपार सांस्कृतिक विविधताओं वाले देश के लिए यह कैसी क्षति होगी? मांसाहार और शाकाहार की बहस, सिर्फ संस्कृति या नैतिकता की बहस नहीं है, यह स्वायत्तता व अधिकार की बहस भी है। क्या हम चाहते हैं कि हम पर भी कट्टरपन का ठप्पा लग जाए? आईआईटी व आईआईएम वैचारिक-सांस्कृतिक दरिद्रता का शिकार होकर कठमुल्ले हो जाएं? हम ऐसा हरगिज नहीं चाहेंगे।
डायचे वेले में शिवप्रसाद जोशी

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